शाहरुख हों या सलमान, एक मायने में दोनों मंच पर खेलती कठपुतलियां हैं। एक रोमांस की कहानी कह रहा है दूसरा एक पुराने रोमांच का जादू जगा रहा है। दूसरों के लिखे हुए संवाद बोलकर, दूसरों के तय अंत तक पहुंचते हुए ये कलाकार चाहे जितनी रोशनी पैदा करते हों, लेकिन वो उधार की रोशनी है। ये उन्हें भी पता है कि वो असली नहीं, नकली हैं। न कोई डॉन है और न कोई जानेमन, बस तीन घंटे का नशा है जिसके बाद नई पोशाकें पहन लेनी हैं, नए संवाद बोलने हैं और नई सौदागरी में लग जाना है। ऐसा नहीं है कि हम इन सबसे अनजान और बेखबर हों। लेकिन फिर क्यों हम चले जाते हैं एक झूठी कहानी में अपनी असली जिंदगी का कुछ हिस्सा लगाने? असल में हर अफसाने में हमारी भी कुछ कहानी शामिल होती है। परदे पर चल रहा रोमांस हमें सकून देता है कि जिंदगी में चाहे जितनी ऊब और घुटन हो, मोहब्बत फिर भी मुमकिन है और एक्शन ये तसल्ली देता है कि सारी नाइंसाफियों के बावजूद एक दिन इंसाफ का होता है। इन फिल्मों में हमारे छूटे हुए ख्वाब होते हैं, हमारी टूटी हुई हसरतें होती हैं। इनमें हमारे जख्म होते हैं, इनमें हमारे मलहम होते हैं। कोई शाहरुख या सलमान और कुछ नहीं करते, हमें कुछ पल के लिए सही, हमारी हदों से बाहर ले जाते हैं। इसलिए जब डॉन दोबारा आता है तो हम पुराने डॉन को याद करने लगते हैं और जानेमन जैसी कोई फिल्म आती है तो उसमें नएपन की कोई उम्मीद तलाशने लगते हैं। इन फिल्मों में हम भी शामिल हैं, इन्हें देखते हुए, इनमें दिखते हुए। कोई अमिताभ या शाहरुख जब गंगा किनारे वाले छोरे को याद करता है तो हममें से ही किसी की नकल करता है।
सोमवार, अक्तूबर 30, 2006
डॉन या इंसान
रविवार, अक्तूबर 29, 2006
सपनों का सिनेमा
फिल्में सपनों का सौदा करती हैं। ये आम राय है कि तीन घंटे के लिए वो हमारी ज़िंदगी से हमारे तनावों को दूर ले जाती हैं। वहां कोई कृष होता है, जो हमारे बदले उड़ान भरता है, कोई मुन्नाभाई होता है जो गांधी की राह पर चलने की याद दिलाता है और कोई जख्मी फुटबॉलर होता है जिसे अपनी कामयाब बीवी के मुकाबले एक हसीन महबूबा मिल जाती है। वहां हंसी के ऐसे मौके होते हैं जो आम तौर पर हमारी ज़िंदगी में नहीं आते, ऐसे नजारे होते हैं जिन्हें हम देख नहीं पाते और ऐसी कहानियां होती हैं, जिन्हें हम बार-बार दुहराते हैं। लेकिन करोड़ों का ये सौदा सिर्फ हमारे ख़्वाबों का नहीं होता, उसमें हमारी हकीकत भी शामिल होती है- इसमें हमारे वो जख्म होते हैं जो बाकी जगहों पर दिखते नहीं, हमारे वो आंसू होते हैं जिन्हें वक्त की सर्द हकीकत जमा डालती है, इनमें हमारी वो इच्छाएं होती हैं जो हमारे मन के अनजान कोनों में ना जाने कब से बसी होती हैं। कामयाब सिनेमा सिर्फ यही करता है कि इन इच्छाओं और ख़्वाबों को ठीक से पहचान लेता है और उनके आसपास एक कहानी बुन देता है। जहां आंसू कुछ ज्यादा बड़े हो जाते हैं, जख्म कुछ ज्यादा अश्लील ढंग से खुले मालूम पड़ते हैं, जहां ख्वाब अपनी सुकुमार सच्चाई से दूर चले जाते हैं। जहां हंसी सहज और खिलखिलाती हुई नहीं रह जाती है, वहां फिल्म हमें बेकार बेमानी मालूम होने लगती है। इस लिहाज से देखें तो फिल्मों में हमारे ख्वाब ही नहीं, हमारी हकीकत भी होती है। वो हकीकत जिसे हम कभी पहचान नहीं पाते और कभी पहचानते डरते हैं। बीती तीन-चौथाई सदी में हिंदी फिल्मों ने जितनी छवियां बनाईं, जितनी पोशाकें दीं, जितने अंदाज दिए, वो सब यही बताते हैं कि हमारी इच्छाओं के आसपास ही बुना जाता है हमारा सिनेमा।
अच्छाई और बुराई
ज़िंदगी आम तौर पर अच्छ या बुरे के खानों में बंटी नहीं होती। हमारे अनुभवों की दुनिया बताती है कि अच्छे और बुरे के बीच एक आवाजाही लगातार चलती रहती है। लेकिन फिर क्यों हम अपने किस्से-कहानियों में जिंदगी को अच्छे और बुरे के खानों में बांटने पर तुले होते हैं? क्या इसलिए कि धूसर रंग की जटिलता हमें समझ में नहीं आती है और उजले और काले के बीच फर्क करना, अपना पक्ष चुनना आसान होता है? हम बड़ी आसानी से कुछ नायक बना डालते हैं कुछ खलनायक- शायद इसलिए भी कि इन आसान कहानियों की मार्फत अपनी मुश्किल सी जिंदगी में आने वाले नायकों-खलनायकों को पहचान सकें। वैसे ज़िंदगी की तरह कई बार कहानियां और फिल्में भी बताती हैं कि अच्छे और बुरे को इस तरह बांटना मुश्किल नहीं। इंसान के भीतर शैतान भी होता है और भगवान भी। कभी उसका जुनून उसे जानवरों से नीचे ले जाता है और कभी उसका विवेक उसे देवताओं से बड़ा बना डालता है। दरअसल अच्छे और बुरे की ये लड़ाई शैतान और भगवान के बीच का ये संघर्ष पूरी सभ्यता की कशमकश है। वो सारे किस्सों की बुनियाद है, सारी फिल्मों की थीम है। शायद इसलिए भी कि इस लड़ाई के बीच ही हम ये समझ भी पैदा करते हैं कि आखिर हम क्यों अच्छे का साथ दें और क्यों बुराई से बचें। ये भी कि कोई अच्छा या बुरा पैदा नहीं होता है। उसका वक्त, उसका समाज, उसके हालात उसे वैसा बना देते हैं। इसमें शक नहीं है कि हिंदी की ज्यादातर फिल्में इस बेहद जटिल सवाल का ज्यादातर बेहद सरल और भावुक सा हल पेश करती हैं। लेकिन इसमें शक नहीं कि किसी नायक को चाहने और किसी खलनायक को कोसने के पीछे हमारा वही जज्बा काम करता है जो इस सभ्यता को इंसानी सभ्यता बना रहा है।