शुक्रवार, अप्रैल 27, 2007

सबसे खतरनाक होता है...

ये कविता नहीं है, गोली दागने की समझ है।
जो सभी हल चलाने वालों को सभी बंदूक चलाने वालों से मिल रही है....

हिंदी के मशहूर कवि आलोकधन्वा की ये पंक्तियां साठ और सत्तर के दशक में उन सपनों की गवाही देती है जिनके आसपास ढेर सारी कविताएं लिखी गईं, जिनके आसपास बिहार और बंगाल के नौजवान, किसानों, मजदूरों और छात्रों ने अपनी कई लड़ाइयां छेड़ीं। तब की भूखी और नंगी पीढ़ियों को मंजिल बड़ी करीब लगती थी, लगता था कि क्रांति नाम का सेब बस एक हाथ दूर है जिसे कल तोड़ लिया जाएगा। लेकिन अस्सी के दशक तक आते-आते वो सारे सपने हांफने लगे- बेरोजगारों में बदल चुकी छात्रों की फौज जिंदगी के जुए में जुत गई, कविताएं चुप्पी के खोल में चली गईं और सपने यथार्थ की जमीन से टकरा-टकरा कर दम तोड़ते रहे। उसी दौर में पाश को लिखना पड़ा- सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। क्रांति के भरोसे का ये छोटा सा जीव किस तरह इतिहास के विराट पहियों के नीचे आ गया, ये हादसा याद और दर्ज करने वाले आज भी बचे हैं। लेकिन वो थके हुए और हताश हैं- शायद कुछ में उम्मीद और भरोसा हो कि आने वाले दिनों में बदलेगी तस्वीर।
हकीकत यही है कि लोग ही नहीं, आंदोलन भी बूढ़े होते हैं, थकान के शिकार होते हैं, हताशा की अंधी गलियों में मुड़ जाते हैं। कई राज्यों में नक्सली आंदोलन भी ऐसी अंधी गलियों में मुड़ा दिखाई पडता है, थकान का शिकार नजर आता है। लेकिन सवाल ये नहीं है कि नक्सलवाद बचेगा या नहीं, या वो मुख्यधारा में शामिल होगा या नहीं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि एक बेहतर समाज का सपना बचा रहेगा या नहीं। सपनों की लाश के आगे प्रेतों की तरह नाचने वाले दरअसल ये नहीं जानते कि व्यवस्थाएं मर जाती हैं, लड़ाइयां हार जाती हैं, नेता राह बदल लेते हैं लेकिन सपने बचे रहते हैं और बचाए रखते हैं एक बेहतर दुनिया का भरोसा।

1 टिप्पणियाँ:

बेनामी ने कहा…

suresh nigam, lucknow:-
behad khoobsoorat... priydarshan ji mai aapka kaayal hu.. aise lekh ab nahi dekhne ko milte.. aapka jawab nahi..