मंगलवार, मई 01, 2007

गुजरात पुलिस की 'देशभक्ति'

रक्षक के भक्षक होने की कहावत पुरानी है- बताती है कि किस तरह ताकत के मद में चूर रहने वाले लोग इंसाफ के साथ खिलवाड़ करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि फर्जी मुठभेड़ें तमाम राज्यों में होती हैं और पुलिस आम तौर पर इतनी संवेदनशील दिखाई नहीं पड़ती कि वो अपना काम करते हुए कुछ सब्र और एहतियात से काम ले। इससे ये पता चलता है कि जो कानून के रखवाले हैं, उनका भी कानून में कम भरोसा है। ये भी कि अक्सर ऐसी मुठभेड़ों के पीछे कानूनी उलझनों से बचकर अपराध को ठिकाने लगाने की मंशा नहीं होती, ये काम कभी अपनी हताशा छुपाने के लिए कभी तरक्की पाने के लिए, कभी किसी और फायदे के लिए और कभी अपनी ताकत पर खुद भरोसा करने के लिए किया जाता है।
गुजरात में आतंकवाद के खात्मे के नाम पर जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ ताकत का गरुर नहीं, उससे कहीं ज्यादा है। इसके पीछे कहीं ना कहीं वो सांप्रदायिक नफरत भी काम कर रही है जो कुछ साल पहले गुजरात के दंगों में दिखी और अब तक कम होने का नाम नहीं ले रही है। वरना जिन लोगों को पुलिस ने आतंकवादी होने के संदेह में मारा, वो कई दिन उनकी कैद में रहे। जाहिर है, उसे सच मालूम हो गया होगा। लेकिन उनकी दिलचस्पी सच से ज्यादा उस झूठ को बचाने में रही होगी जिसका खेल आतंकवाद से मुकाबले के नाम पर राज्य की पुलिस अरसे से करती रही है। टाडा और पोटा में गिरफ्तारियों से लेकर नकली मुठभेड़ों में हत्या तक ये सिलसिला अलग-अलग शक्लों में दिखता है। खौफनाक ये है कि एक हत्या को छुपाने के लिए पुलिस दूसरी हत्या करती है और उसके खून सने हाथों के बावजूद नेता उनकी पीठ थपथपाते हैं।

4 टिप्पणियाँ:

नीरज दीवान ने कहा…

यह दंगाई सरकार खुद ही अपने बोझ से दबनी शुरू हो गई है.

बेनामी ने कहा…

प्रियदर्शन जी आपका लेख पढ़ा,बदले में एक जागरूक पाठक कि हैसियत से अपना मत व्यक्त कर रहा हूं.... हम सभी सोहराबुद्दीन की हत्या को एक अमानवीयता तथा पाश्विक हरकत के रूप में व्यक्त कर रहे है,जो निश्चित ही निंदनीय है,लेकिन सत्य बहुकोणीय होता है,अतः मामले के अन्य कोणों पर भी विचार होना चाहिए,मसलन,सोहराबुद्दीन कौन था,तथा उसकी क्या महत्वाकांक्षाएं थी,यदि इस प्रश्नों की पड़ताल करेंगे तो निश्चित ही आप उसके इसी प्रकार के अंत की अपेक्षा करते। सोहराबुद्दीन मूल रूप से अवैध हथियारों का स्मगलर था, तथा झिरनिया(जिला उज्जैन,म.प्र)में उसके पास से २४, ऐके-४७ राइफले मिली थी इस मामले की वर्ष १९९३-९४ में सीबीआई जांच भी हुई लेकिन उंचे रसूक के चलते वह बच निकला,इस मामले के बाद वह मालवा(म.प्र) का डॉन बनने की कोशिशों में जुट गया,मध्यभारत में वह हथियारों की तस्करी से लेकर हर गैरकानूनी धंधे में अपना दखल रखता था,ना मालूम कितने ही लोग इसके हथियारों से मारे गये होंगे,कितने ही घरों को इसने बरबाद किया होगा,एक ऐसा व्यक्ति जो न्यायिक प्रक्रिया से मुक्त हो चुका हो,उसे सज़ा देने की आखिरी उम्मीद ईश्वर से ही होती है,जिसे लोकभाषा में ईश्वरीय न्याय या प्राकृतिक न्याय कहा जाता है,जो इतने ही क्रूर रूप में हमारे सामने आता है। आज फिर हम मानव अधिकारों की दुहाई देकर सोहराबुद्दीन के और उसकी पत्नि के संबंध में सहानुभूति पूर्ण वातावरण निर्मित करने के प्रयास में है,लेकिन क्या ये सही है कि एक हथियारों के तस्कर के साथ इस प्रकार की सहानुभूति दिखाई जाए,

प्रियदर्शन जी,हमारे संविधान में मानवाधिकारों को स्पष्ठ रूप से रेखांकित किया गया है,तथा व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को सर्वोपरी मानते हुए विभिन्न प्रावधान किये गये,लेकिन इसके साथ ही राष्ट्र की एकता और अखंडता को हमने व्यक्तिगत् स्वतंत्रता से अधिक महत्व दिया,तथा आवश्यक पड़ने पर व्यक्ति के प्राणांत का अधिकार भी अपने पास निहित रखा है।ऐसी स्थिति में सोहराबुद्दीन के मरने को एक वध की संज्ञा देता हूं... लेकिन इसका यह अर्थ नही कि उनके हत्यारों के प्रति मुझे कोई सहानुभूति है, मैं बस इतना कहना चाहता हूं जो जैंसा करता है वैंसा भरता है.... इसलिए मामले के दूसरे पक्ष पर भी थोड़ा प्रकाश डालें ..... धन्यवाद आशुतोष दीक्षित dixit5555@rediffmail.com

Suresh Chiplunkar ने कहा…

प्रियदर्शन जी,
सोहराब के बारे में आप कितना जानते हैं पता नहीं, लेकिन हम उज्जैन के लोग उसके बारे में बहुत कुछ जानते हैं, सोहराब के जनाजे में देशद्रोही नारे लगाये गये थे... कृपया सोहराब से जुडी मेरी यह पोस्ट जरूर पढें..
http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2007/04/blog-post_30.html
स्यापा अधिक इसलिये हो रहा है कि वह मुसलमान है और गुजरात में मारा गया है, यानी कि सेकुलरवादियों और मानवाधिकारवादियों के लिये काम ही काम...
फ़िर जवाब दीजियेगा...

priyadarshan ने कहा…

सवाल सोहराबुद्दीन का नहीं है, उस व्यवस्था का है जो सोहराबुद्दीन को बनाती है। सोहराबुद्दीन इस देश में आतंकवाद की वजह नहीं, उसका परिणाम भर है। दरअसल अपनी व्यवस्था से जो बहुत गहरे असंतोष हैं, जो उसकी अपर्याप्तताएं हैं, उसकी वजह से कहीं नक्सली पैदा हो रहे हैं, कही आतंकवादी। हम ये देखने की कोशिश नहीं करते कि इस असंतोष के पीछे कितनी राजनीति है, कितना प्रशासन है और कितना पुलिसिया जुल्म है। निश्चित तौर पर सोहराबुद्दीन के साथ हमें सहानुभूति नहीं होनी चाहिए। लेकिन उसे कानून के जरिए सजा दिलाने का विकल्प बंद करने वाले (यानी उसकी मदद करने वाले) और उसे फर्जी मुठभेड़ के नाम पर मार डालने वाले एक ही जमात के लोग हैं। एक बचाता है दूसरा मारता है। दोनों ताकत का गलत इस्तेमाल करते हैं। फिर सवाल कौसर बी का भी है- उस बेकसूर को जिस तरह मार कर जला दिया गया और ये बात साल भर छुपाए रखी गई, उससे तो एक डीआईजी किसी हथियार तस्कर से ज़्यादा बड़ा अपराधी साबित होता है। वैसे ये आपकी टिप्पणी का उत्तर नहीं, बस उसका विस्तार है। मैं मानता हूं कि एक स्तर पर हमारी-आपकी चिंताएं एक हैं।
प्रियदर्शन