शनिवार, मई 05, 2007

दुनिया का मकड़जाल और स्पाइडरमैन

तर्क और विज्ञान की इस दुनिया में स्पाइडरमैन जैसा कोई किरदार क्यों करोड़ों लोगों को अपने साथ बहा ले जाता है? क्या इस नई दुनिया से आक्रांत हमारे भीतर के किसी धूल भरे कोने में अपनी स्मृति के जाले में सिमटी कोई मकड़ी है जो इस स्पाइडरमैन में अपने हिस्से का भरोसा खोजती है? या किसी ईश्वर की चाहत में भटकता हमारा मन किसी सुपरमैन, स्पाइडरमैन या फिर शक्तिमान और हनुमान जैसे किरदारों से समझौता कर तसल्ली हासिल कर लेता है? इसमें संदेह नहीं कि हमारे बहुत सारे नायक हमारी आस्था से नहीं, हमारे डर से पैदा होते हैं। वो हमारी हिफाजत की गारंटी देते हैं, वो बताते हैं कि जब कोई काली छाया अपना हाथ हमारे ऊपर डालने की कोशिश करेगी वो कहीं से प्रगट होंगे और हमें बचा लेंगे। वो इस दरकती, टूटती और जलती हुई दुनिया में कहीं से आएंगे और हमारा हाथ थाम हमें वक्त के किसी सुरक्षित टापू में पहुंचा देंगे। लेकिन शायद ये सिर्फ डर भी नहीं है। एक स्तर पर ये हमारे भीतर की निडरता भी है जो जानती है कि तमाम हालात में किसी नामुमकिन लगने वाले ढंग से भी इंसान बचा रहेगा। इस ढंग से देखें तो सुपरमैन भी हमारे भीतर हैं और स्पाइडरमैन भी- वो लाल हो या काला, वो अहसान करे या बदला ले, वो नेकी करने के लिए निकले या तबाही का सामान खोजे, निकलता वह हमारे भीतर से ही है। कभी हम उससे लड़ते हैं और कभी उसे पोसते हैं। शायद यही वजह है कि नया होते हुए भी स्पाइडरमैन हमारी सबसे पुरानी स्मृतियां कुरेदता हैं, वो उन हिस्सों में एक पत्थर डालता है जिनकी तरंगें बहुत दूर तक जाती हैं। सात समंदर पार से चलकर आया ये स्पाइडरमैन हमें इसीलिए बहुत पराया या अविश्वसनीय भी नहीं लगता। हम जानते हैं कि जो कुछ वो कर रहा है, शायद नहीं कर सकता, लेकिन हम चाहते हैं कि वो ऐसा कर सके। और इसीलिए उसकी कामयाबी नहीं, उसकी कोशिश उसे हमारे लिए अपना बनाती है। स्पाइडरमैन हर बार लड़ता है और हर बार नई लड़ाई के लिए तैयार होता है।

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