फिल्म यात्रा में रेखा वो किरदार है जिसे लेखक खोजने निकला है। खोजता है तो पाता है कि ये कोई और रेखा है। दरअसल रेखा अक्सर ऐसे ही अनजान बिंदुओं से बनती रही हैं। कभी अपने किरदारों में ढली, कभी उनके बाहर खुद को खोजती हुई। फिल्म उमराव जान के आखिरी हिस्से में अपने बचपन के शहर में पहुंचकर उमराव जान पूछती है, ये क्या जगह है दोस्तों ये कौन सा दयार है। ये सवाल उमराव जान का है या रेखा का जो शायद उमराव जान की आंखों से अपना बचपन, अपना सफर देख रही हो? वो कौन सी चीज होती है जो किसी अभिनेत्री के हिस्से किसी किरदार की तकलीफ, उसका अकेलापन, उसके सवाल भर देती है? और उमराव जान या रेखा ये सवाल किससे पूछ रही है। दरअसल ये अपने-आप से पूछा गया सवाल है, उन निगाहों से जिनके आगे गुबार ही गुबार है। कोई अभिनय इसीलिए सच्चा होता है कि हम उसमें उतर कर अपने हिस्से की तकलीफें अपने हिस्से के सवाल पूछते हैं। सिर्फ एक कामयाब फिल्म करने की इच्छा या एक बेहतर अभिनेत्री होने का गुमान होता तो शायद रेखा इस अभिनय में वो जान नहीं डाल पातीं जो उन्होंने डाल दी है। यहां से एक दूसरी विडंबना हमारा पीछा करती है। ये कौन रेखा है जिसे हम पहचानते हैं? ढेर सारी फिल्मों के परदे के पीछे खड़ी, ढेर सारी अलग-अलग भूमिकाओं को जी रही वह असली रेखा कैसी है जो दूसरों के बुने तनावों को सेट पर ही सही, लेकिन अपना बना लेती है? ये रेखा दोस्ती करती है तो गॉसिप से घिरती है, मोहब्बत करती है तो चोट खाती है, झगड़े करती है तो बदनाम होती है, अकेले और उदास रहती है तो किसी की नजर नहीं पड़ती। ये हकीकत से ज्यादा हमारे ख्वाबों की रेखा है- लोग इस रेखा पर फिदा होते हैं, उनकी अदाओं के दीवाने होते हैं, लेकिन शायद ही देख पाते हैं कि जिसने उन्हें इतने ख्वाब, इतने इंद्रधनुष दिए, उसके हिस्से का आसमान कितना सूना है।
रविवार, मई 06, 2007
कई बिंदुओं से बनी 'रेखा'
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2 टिप्पणियाँ:
पता नहीं क्यूं कुछ लोग रेखा के बारे में बात करते हुए कुछ ज्यादा ही रूमानी हो जाते हैं। रेखा एक अच्छी एक्ट्रेस थी, इसमें शक नहीं। किंतु जिन गानों और डायलॉग्स का हवाला आपने दिया है वो रेखा ने नहीं किन्ही और लोगों ने लिखे हैं। रेखा को व्यक्तिगत रूप से जानने वाले बताते हैं कि वो सौंदर्य के अहम में जीने वाली एक मामूली अभिनेत्री भर हैं। उनके चेहरे ने उन्हें भले ही उमराव जान जैसी भावपूर्ण फिल्म दिला दी, उन्होंने आगे चलकर बी और सी ग्रेड की फिल्मों में काम करके जता दिया कि उनकी रेंज कितनी है। पता नहीं आप लोग कब तक उमराव जान और सिलसिला की याद कर आहें भरते रहेंगे।
Rupaji,
kuch log nahi, hindi cinema me ruchi rakhnewale jyadatar log Rekha ki baat karte hue rumani ho jate hain. Rekha me baat hi kuch aisi hai. Ho sakta hai ki unhone kuch galat filmon ka chunav kar liya ho, lekin is azim adakara ko hamesha umraojaan aur silsila jaise filmon me yaadgagr kirdaar ke liye hi yaad rakha jayega. Rekha ki range ko mahaz do filmon tak mahdood rakhne ke pahle Rupaji ko meri salah hogi ki vo unki filmon ki puri tarah jaankari kar len. Priyadarshanjee ne kam shabdon me Rekha ki shakshiyat par achhi roshni dali hai.
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