बुधवार, जून 06, 2007

कौन कोच देगा जीत की गारंटी

बैंगलुरू में टीम इंडिया का कोच चुनने बैठे लोग कुछ वैसा ही तामझाम दिखा रहे हैं जैसा उन्होंने 2005 की मई में दिखाया था। लेकिन उस वक्त ढोल-ताशे और नगाड़े के साथ जो हाई प्रोफाइल कोच लेकर हम आए, उसने टीम को जोडने और जिताने की जगह तोड़ दिया। शायद उसी अनुभव का दबाव है कि भारतीय क्रिकेट के आला अफसर इस बार फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। लेकिन वो ऐसा कोच ले ही आएंगे जो टीम को जिता देगा, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। दरअसल मुश्किल ये है कि बीसीसीआई ये समझने को अब भी तैयार नहीं कि क्रिकेट के मैदान में खेलते खिलाड़ी हैं, कोच सिर्फ उनका मददगार हो सकता है। ऐसा मददगार कोच चुनने के लिए समितियां बनाना, बैठकें करना, कुछ सूचनाएं छुपाना, कुछ देना- ये सब बताते हैं कि कोच का चुनाव फिर से एक तमाशा होने जा रहा है।
शायद इसलिए भी इन दिनों हमने क्रिकेट को इतना बड़ा बना डाला है कि उसके छोटे-छोटे फैसले भी विशालकाय हो जाते हैं। भारतीय टीम का कोच चुनने में पिछली बार जो तामझाम दिखा, उसका असर ये हुआ कि कोच कप्तान से बडा हो गया, क्रिकेट से बडा हो गया। इस कोच ने कच्ची मिट्टी की तरह टीम को गूंथने की कोशिश की, बिना ये समझे कि ये पके हुए खिलाडी हैं। इसी की वजह से रिश्ते बिगड़ा, मामला बिगडा और खेल बिगड़ गया। ये ठीक है कि इस बार हम दूसरी अति पर न चले जाएं और कोच की भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज न कर डालें। दरअसल जरूरत एक संतुलित दृष्टि की है जो टीम की जरूरत भी समझे और कोच की भूमिका भी।

1 टिप्पणियाँ:

अनूप शुक्ला ने कहा…

सही है! कौन देगा गारंटी जीतने की!