रविवार, जून 17, 2007

एक धड़कती हुई इमारत

साढ़े तीन सौ साल पुरानी एक सफेद इमारत में मोहब्बत की एक कहानी सोई हुई है। बगल में यमुना बह रही है। दूर किसी किले में कैद एक बादशाह इस इमारत को देख रहा है। लेकिन ये सदियों पुरानी बात है। अब न वो बादशाह है न वो जमाना है। नदी भी वो नहीं रही। लेकिन ताजमहल बना हुआ है। दरअसल अगर वो पत्थर की एक इमारत भर होता जो किसी बादशाह की जिद, उसके गरुर की निशानी होता तो वक्त और यादों की धूल न जाने कब उस पर छा गई होती। वो उस मोहब्बत का अफसाना भी है जो इंसान को हमेशा नौजवान बनाए रखता है। शायद यही वजह है कि दुनिया ताजमहल की तरफ खिंचती है, उसे अपने सबसे बड़े अजूबों में गिनती है। लेकिन दुनिया ही ताजमहल को नहीं देख रही, ताजमहल भी दुनिया को देख रहा है। हम अक्सर इस बात पर गौर नहीं करते कि कभी-कभी कलाकृतियां भी हम पर नजर डालती हैं। ताजमहल अगर धड़कती हुई इमारत लगता है, अगर उसके साये में बैठने की इच्छा होती है, अगर वो प्रेम के एक बड़े प्रतीक की तरह बचा हुआ है तो इसलिए कि उसकी धूल में खोई, उसकी मिट्टी में दबी, उसकी मरमरी दीवारों में रची मोहब्बत की एक इच्छा शायद अब भी कहीं आवाज देती है। खास बात ये है कि ताजमहल प्रेम की सफलता का नहीं, उसकी निरंतरता की निशानी है। वह तब बना है जब जिस्म चला गया है, सिर्फ प्रेम बचा रह गया है। वो एक याद है जिसकी अपनी खुशबू है। ये खुशबू अब तक इसलिए बनी हुई है कि ऐसे प्रेम में हमारा भरोसा बना हुआ है।
(दुनिया के सात आश्चर्यों की खोज पर विशेष)

1 टिप्पणियाँ:

मंगल, रायपुर ने कहा…

ताज प्यार की मिसाल है..प्यार शाश्वत है.. इसमें आश्चर्य कैसा। ताज को दुनिया के आश्चर्यों की सूची में नहीं डाला जाना चाहिए.