गुरुवार, जून 21, 2007

मैं आसमान हूं!

मैं आसमान हूं। इंसान की कल्पना जहां तक जा सकती है, उसके आगे भी फैला हुआ हूं। मुझमें न जाने कितने चांद और सूरज बसते हैं। मैं न जाने कितने ग्रहों, उपग्रहों, तारों और आकाशगंगाओं का घर हूं। मेरे अछोर अंधेरों के बीच रास्ता खोजते अनंत प्रकाश रेखाओं के पथ पर कांपते टिमटिमाते तारे न जाने कितनी सदियों के बाद एक-दूसरे को देख भर पाते हैं। लेकिन मैं इतना बड़ा होकर भी एक शून्य भर हूं। अपने सन्नाटों में सिर्फ अपना चक्कर काटता हुआ। कहते हैं कभी किसी विराट विस्फोट से पैदा हुआ मैं न जाने कितने युगों और कल्पों का सन्नाटा झेल रहा हूं...और झेलता रह जाता अगर मुझे धरती की धूल नसीब न होती। दरअसल ये इंसान है जो मुझे आकार और अर्थ देने में लगा है। वही मेरे अंधेरों के आरपार देखने में जुटा है, मेरी आकारहीनता के बीच बना रहा है रास्ता। वह चांद, मंगल, शुक्र और शनि के भीतर अपनी धरती की किसी जुड़वां बहन, किसी हमशक्ल की तलाश में है। मैं देखता हूं, वह अपनी छोटी सी दुनिया के बाहर जाकर मेरी तमाम परतों को खुरच रहा है। जान जोखिम में डालकर अपनी धरती से लाखों करोड़ों मील दूर उस बियावान में पांव रखने की हिम्मत दिखा रहा है जिसके आसपास, ऊपर-नीचे, दूर-दूर तक कुछ भी नहीं। मैं चाहता हूं, उसका सफर पूरा हो, वो जहां तक जाए, कामयाब होकर लौटे। लेकिन अपनी दुआओं से ज्यादा मुझे इंसान की हिम्मत से ये भरोसा मिलता है कि उसका यान सारी मुश्किलों के बाद भी धरती पर लौटेगा। मैं बस इतना याद दिलाना चाहता हूं कि कुदरत उनका साथ देती है जो अपने ऊपर भरोसा रखते हैं। मैं आसमान हूं, लेकिन इंसान के आगे झुक जाता हूं।

1 टिप्पणियाँ:

सुबोध राय ने कहा…

मेरे पास तारीफ के लिये शब्द नहीं हैं शायद बेजोड़ मैने इसे एनडीटीवी पर देखा या कहें सुना तब से मुझे इसके लिखने वाले की तलाश थी मुझे खुशी है कि मेरी ये तलाश पूरी हुई