वो एक खुरदरा चेहरा है, जिसकी नाक चुभती है, जिसकी आंख का तीखापन गड़ता है, जिसके तेवर एक बार चौंकाते हैं। ध्यान से देखें तो 55 पार के रजनीकांत में ऐसा कुछ नहीं जो उन्हें बहुत बड़ा सितारा बनाए। रजनीकांत के बहाने फिर ये सवाल पूछने की इच्छा होती है कि वो क्या चीज है जो अभिनेताओं को इतना बडा सितारा, इतना बड़ा सौदागर बनाती है कि उनकी दौलत आसमान छूने लगती है? वो क्या बेचते हैं? चंद झूठी कहानियां या कुछ और। चलते-फिरते दृश्यों का करिश्मा, नाच-गाने, सजा-संवार कर तैयार किए गए नजारे...या एक नकली जिंदगी का ख्वाब जो हमें तीन घंटे का सुकून देता है? दरअसल सिनेमा हमारी जिंदगी का वो हिस्सा है जो हम जी नहीं पाते लेकिन जिसके साथ हम जीते हैं। उसमें हमारा गुस्सा बोलता है, हमारी मोहब्बत गाती है, हमारी नफरत सर उठाती है... उसमें हमारी कुंठाएं दिखती हैं, हमारी शर्म आंख नीची करती है और हमारी बेशर्मी भी अंधेरे में सिर उठाती है। ये सच है कि जज्बात के इस खेल में दुकानदारी भी चली आती है, कभी-कभी हकीकत को बेहद वाहियात ढंग से पेश किया जाता है, लेकिन अगर सिनेमा न होता तो शायद हमारी कुंठाएं ज्यादा बड़ी होतीं। सिनेमा ने हमें हमारे सबसे बड़े नायक दिए हैं। ऐसे नायक, जिन्हें हम पूजते हैं, जिन पर मर-मिटने को तैयार रहते हैं, जिनके जैसा हम होना चाहते हैं। वे असली नहीं हैं, लेकिन उनका होना हमारे लिए एक राहत है। सिनेमाघर के जादुई अंधेरे कोने से जो दुनिया हमारे आगे खुलती है, उसमें हमारा मन भी बोलता है। जो नायक वहां दिखते हैं, उनमें हमारी सांसें भी शामिल होती है, हमारी चाल भी और हमारे जाल भी। उनकी कीमत का राज यही है। रजनीकांत अगर सारे सितारों से ऊपर हैं तो इसलिए कि मनोरंजन के इस कारोबार में उन्होंने अपनी एक खास छवि बनाई है- वो छवि जिसमें अपनी तरह के लटके-झटके भले हों, लेकिन जो लोगों के अपने करीब लगती है। वो एक आईना हैं जिसमें एक समाज अपना चेहरा देखता है।
बुधवार, जून 20, 2007
रजनीकांत... द बॉस
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3 टिप्पणियाँ:
आप्का सवाल सही है कि इन सितारो मे ऎसा क्या है जो इन्हे सितारा बना देता है। मेरा मानना है कि यह हमारे अधुरे सपने है जो इन्हे इस बुलन्दी पर ले जाते है.
हम खुद को राजकपूर वाला गरीब मानते है, भोला मान्ते है , हम नाना पाटेकर की तरह अन्याय के साम्ने लडना चाहते है और रजनीकान्त की तरह अलग अदाये मारना चाह्ते है.
हम अपने इन िकरदारों में अपने सपनों को देखते हैं। उन सपने को जीते हैं जो अब तक केवल आखें बंद करके ही देखते हैं। उन अधूरी भावनाओं को देखते िजन्हें हम खुद पूरा नहीं कर सके। हममें अिधकतर अपने हार से नाराज होते हैं िक जब हमारा जीतता है, तभी हमें खुशी िमलती है।
इन सितारों में ऐसा क्या है, जो इन्हें सितारा बना देता है, यह सवाल अपनी जगह है. लेकिन रजनीकांत की लोकप्रियता का एक कारण उनका अपनी जडों से जुडा होना और विनम्रता भी है. जो रजनी को जानते है, वे जानते है कि सितारों जैसा कोई नाजोनखरा रजनी नही करते. मैने एक चिठ्ठा लिखा है, जिसमें इसकी चर्चा की है. जिज्ञासु देख सकते है.
देविदास देशपांडे
http://devidas.rediffblogs.com/
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