बुधवार, जुलाई 11, 2007

आतंकवाद की सियासत

मैं आतंक हूं। मैं ट्रेन के धमाकों में, बिखरी हुई बोगियों में आता हूं। मैं रोते-बिलखते चेहरों में, न लौटने वाले मुसाफिरों की यादों में बचा रहता हूं। मैं छुपा कर रखे गए बमों, किसी घड़ी की तरह टिकटिक करते विस्फोटकों की शक्ल में दाखिल होता हूं और फूट पड़ता हूं। मेरे किरचे प्लेटफॉर्म पर, पूरे शहर में, पूरे मुल्क में पसर जाते हैं। मैं आतंक हूं, अक्सर किसी नामालूम मकसद की ओट में, किसी मासूम गुस्से की मदद से, काम करता हूं। मैं उन छात्रों और नौजवानों को हथियार बनाता हूं जो हाशिए पर हैं, जो पिटे हैं जो मायूस हैं। पहले मैं जज्बात से खेलता हूं, फिर खून से और इसके बाद सियासत से। मैं बाहर से आता हूं और भीतर घुल मिल जाता हूं। मैं कई जुबानें जानता हूं और वक्त पड़ने पर इस्तेमाल भी करता हूं।
मैं आतंक हूं, मेरी अपनी राजनीति है जिसे सरकारें भी खूब पोसती हैं। ये मेरा खौफ है जो इक्कीसवीं सदी के आजाद कहे जाने वाले मुल्कों के नागरिकों पर एक के बाद एक पाबंदी बढ़ा रहा है। मैं लंदन और ग्लासगो की नाकाम साजिशों में हूं, मुंबई के लोकल में हूं, लंदन के ट्यूब्स में और न्यूयार्क के टावर्स में। मैं दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क की सबसे ऊंची इमारत को जला डालता हूं। मैं पूरी दुनिया में हूं- दुनिया भर की सरकारें मुझे पहले ताकत देती हैं और फिर मुझसे लड़ने के तरीके खोजती हैं।
मैं आतंक हूं, मेरा अपना धर्म है जिसके अपने धर्मगुरु हैं। लोग मुझे अलग-अलग कौम के तौर पर पहचानने की कोशिश करते हैं और भूल जाते हैं कि आतंक की कोई जात नहीं होती। मैं छोटे-छोटे मकसद के लिए बड़े-बड़े गुनाह करने में हिचकता नहीं। मुझसे निबटने के लिए कानून बनाना काफी नहीं। हां, मुझे खत्म करने के लिए समाज को बदलना जरूरी है क्योंकि इस समाज की सलवटें जब दूर होंगी, जब वहां फांक कम होगी तो मेरी गुजाइश, मेरी जगह भी खत्म होती चली जाएगी। मैं आतंक हूं, लेकिन मुझपर वार करने से पहले मेरे होने की वजह समझें।

2 टिप्पणियाँ:

अनूप शुक्ला ने कहा…

आतंकजी हम आपसे डर गये।

सुबोध राय,लखनऊ उत्तर प्रदेश ने कहा…

आतंक की आग जिन्होने लगाई, बुझानी भी उन्ही को पड़ेगी। ये क्रिया प्रतिक्रिया का खेल है जिसका शिकार हम सभी हो रहे हैं।