मंगलवार, अगस्त 14, 2007

हमारे समाज का रोग

एड्स एक बड़ी बीमारी है- बेहद खतरनाक भी, लेकिन कोई समाज जितना बीमारियों से नहीं मरता, उतना अपने रवैये से नष्ट होता है। एड्स का हम मुकाबला कर सकते हैं, लेकिन उस डर, उस नासमझी का सामना कैसे करें जो अमानवीय ढंग से हमें अपने ही समाज के कुछ असहाय लोगों से काट डालती है, उन्हें अछूत बना डालती है। भारत सिर्फ एड्स का नहीं, कई बीमारियों का घर है। उन्नीसवीं सदी की बीमारियां इस इक्कीसवीं सदी में पलट कर हमला कर रही हैं। हम प्लेग, और पोलियो से भी लड़ रहे हैं। कैंसर एड्स की ही तरह रहस्यमय और जानलेवा बीमारी बना हुआ है। डायबिटीज को खामोश महामारी कहा जाता है। लेकिन और भी कई खामोश महामारियां इस समाज को बीमार बनाने में लगी हैं। हमने एक चमकता हुआ भारत बनाया है, लेकिन इस भारत में कई हांफते, खांसते, कराहते भारत भी शामिल हैं। वो बेदखल भारत शामिल हैं जो अपने घर-परिवार से सैकड़ों मील दूर जिंदगी और रोजगार की जद्दोजहद में रोज खुद को गला रहे हैं। छोटे-छोटे शहरों से देश के महानगरों तक जिंदगी की तलाश में पहुंचे ये लोग अपने जिस्म में मौत के कीड़े लेकर लौटते हैं और उनके घरवाले जान तक नहीं पाते कि आखिर उन्हें बीमारी क्या है। ये वो एड्स है जो शरीर को नहीं, समाज को खा रहा है। फिर कहना होगा कि इस एड्स का इलाज सिर्फ एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी से नहीं हो सकता। इसके लिए पूरे समाज की धमनियां साफ करनी होंगी, उसका रक्त बदलना होगा। ये काम आसान नहीं है, लेकिन इसके बिना हम एड्स और कैंसर के इलाज खोज भी लें तो भी अपने समाज को नहीं बचा पाएंगे। क्योंकि लोग इसलिए नहीं मर रहे कि दवाएं नहीं हैं, इसलिए मर रहे हैं कि उनके पास दवाओं तक पहुंचने के साधन नहीं हैं।

2 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

गहन चिन्तन, चंदु भाई.

आशा का दीप जलाये रहें,
परिवर्तन की राह रोशन करने को.

चंद्रप्रकाश ने कहा…

समीर जी, आपकी प्रतिक्रिया में थोड़ा बदलाव चाहूंगा। मैं बस प्रियदर्शन जी के लिखे लेखों को इस ब्लॉग पर डालता हूं। आपकी प्रशंसा प्रियदर्शन जी के लिए है.