मंगलवार, अगस्त 14, 2007

नहीं दबेगी तसलीमा की आवाज

तुम एक बैठी हुई चिड़िया को मार सकते हो।
तुम एक उड़ती हुई चिड़िया को मार सकते हो।
तुम उड़ने को तैयार एक चिड़िया को मार सकते हो।
लेकिन तुम दूसरी चिड़िया में उड़ने की इच्छा को नहीं मार सकते।

ये जानी पहचानी कविता फिर याद दिलाती है कि तसलीमा नसरीन या किसी लेखक को या उसके विचार को धक्कामुक्की करके हटाया और खत्म नहीं किया जा सकता। तसलीमा पर हमले की कोशिश ने सबको इतना तो बता ही दिया है कि तसलीमा की किताब अब तेलुगू में भी आ रही है। वो अनजाने में उन पाठकों तक पहुंच गई हैं जिनसे उन्हें दूर रखने की कोशिश की गई। दरअसल विचार या सरोकार की ताकत यही होती है। जब भी किसी विचार पर पहरा बिठाया जाता है, जब भी किसी सरोकार पर बंदूक तानी जाती है, वह जैसे उड़ान भर कर कहीं और पहुंच जाता है। किताब को जलाया जाता है तो उसकी राख कई किताबों में बदल जाती है। किसी तस्वीर को बिगाड़ा जाता है तो कई और तस्वीरें बनने लगती हैं। लेकिन सवाल है कि कुछ लोगों को तसलीमा नसरीन क्यों डराती है? क्या इसलिए कि वो सच लिखती है? इसलिए कि वो कुछ ऐसा लिखती है जिससे धर्म और नैतिकता की उनकी ठेकेदारी खतरे में पड़ती है? क्या इसलिए कि वो ईश्वर पर सवाल उठाती हैं और औरत के लिए जीने की आजादी और जगह मांगती हैं? दरअसल तसलीमा बहुत महान लेखिका भले न हो, उसने बहुत ऊंचे दर्जे का साहित्य भले न रचा हो, लेकिन उसने ऐसा साहस दिखाया है जो इस वक्त में कहीं नजर नहीं आता। यही साहस तसलीमा को एक प्रतीक में बदल डालता है जिस पर हमला लोगों को खुद पर हमला लगता है।

1 टिप्पणियाँ:

हरिराम ने कहा…

कई मामलों में प्रतिबल अधिक प्रबल देता है। विरोध हो तो अधिक शक्ति मिलती है। यदि किसी दर्पण में एक छवि नजर आती है, उसको फोड़ कर टुकड़े टुकड़े कर दें तो हर टुकड़े में एक एक कर अंसख्य छवियाँ प्रकट होंगी।

अतः किसी बात का विरोध करना है तो सही तरीका है उसे नज़रअन्दाज करना।