मंगलवार, सितंबर 04, 2007

न्यूक्लियर डील के सियासी सवाल

क्या कांग्रेस को ये शिकायत करने का हक है कि लेफ्ट फ्रंट एक नाजायज मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दे रहा है? खुद कांग्रेस कम से कम चार सरकारें इससे कहीं ज्यादा हल्के राजनीतिक खेल करते हुए गिरा चुकी है। चरण सिंह के साथ इंदिरा गांधी और चंद्रशेखर के साथ राजीव गांधी के पुराने पड़ चुके संक्षिप्त खेल को भूल भी जाएं तो भी संयुक्त मोर्चा की सरकार को एक बार प्रधानमंत्री बदलने के नाम पर कांग्रेस झटका दे चुकी है और दूसरी बार एक अंतरिम रिपोर्ट की बुनियाद पर गिरा चुकी है। दरअसल भारत में गठबंधन की राजनीति ऐसे ही झटकों से आगे बढ़ती रही है। 1998 में जयललिता की समर्थन वापसी की वजह से सिर्फ एक वोट से एनडीए सरकार गिर गई। कहा जा सकता है, उसके बाद गठबंधन के दलों ने अपने बालिग होने के सबूत पेश किए हैं और तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद सरकार चलाए रखने को अहमियत दी है।
1999 की वाजपेयी सरकार ने जिस तरह आपसी टकरावों और मतभेदों के बावजूद पांच साल पूरे किए, उससे लगा कि गठबंधन की राजनीति किसी तरह सत्ता पर काबिज बने रहने की राजनीति बन गई है। इस लिहाज से देखें तो लेफ्ट फ्रंट ने तीन साल में कम समझौते नहीं किए। उसने कई मामलों में विपक्ष का रोल अदा किया और फिर भी सरकार बनाए रखी। फिर वो कौन सी मजबूरी है कि अमेरिका के साथ एटमी करार को लेकर वो बिल्कुल सारे रिश्ते तोड़ने पर आमादा है? इसमें हो सकता है, कुछ अहम के टकराव भी हों, लेकिन फिर भी इंसाफ का तकाजा है कि इसे हम उसकी वैचारिक पहल की तरह देखें और मानें कि एक हद के बाद समर्थन वापस लेने का हक उसको बनता है। लेकिन तब लेफ्ट को ये भी बताना चाहिए कि विदेश नीति के जिस सवाल पर या अमेरिका से दोस्ती के सवाल पर वो सरकार गिराने जा रहा है, क्या उसका कोई वैकल्पिक रास्ता उसके पास है? दरअसल लेफ्ट अगर ऐसा कोई कदम उठाता है तो भारतीय राजनीति फिर नए सवालों और नए गठबंधनों की तलाश में सडक पर और जनता के बीच होगी।

1 टिप्पणियाँ:

Rama ने कहा…

दरअसल यहां मुद्दों की लड़ाई है ही नहीं. ज्यादातर हल्ला करने वाले लेफ्ट के नेताओं और चिल्लाने वाले कांग्रेसियों से यही पूछ ले कि न्यूक्लियर डील है क्या तो वे नहीं बता पाएंगे. इसकी कमियों के बारे में बता नहीं पाएंगे. हां यह जरूर है राजनीति की नाव में सवार होकर भेड़ चाल चल रहे है. एक ने कहा कि सरकार गलत है तो सबने कहा सरकार गलत है. किसी ने नहीं बताया क्यों गलत है. खैर राजनीति में सब जायज है...