बुधवार, सितंबर 12, 2007

हमारे युग की गीता

कुरुक्षेत्र में सेनाएं सजी हैं। दोनों तरफ एक से बढ़कर एक योद्धा हैं। ऐसे योद्धा जिनके धनुष की टंकार से धरती डोलती है। सब अपने-अपने हिस्से का महाभारत लड़ने यहां मौजूद हैं। लेकिन उत्तेजना और आतंक के इस चरम पर महाभारत का कथाकार कथा का प्रवाह रोक लेता है। अब योगीश्वर कृष्ण आते हैं, कर्म से विमुख और मोह से ग्रस्त अर्जुन को उसके हिस्से का कर्तव्य समझाते हुए। महाभारत संकट की कथा है- एक ऐसे युग की कथा जहां मूल्यों की टकराहट में रोज उठ रहे हैं नए सवाल। और इस संकट का, इस टकराहट का जो सबसे चरम बिंदू है, वहां रची जा रही है गीता। सेनाएं ठगी और भूली हुई खड़ी हैं, अर्जुन कृष्ण का विराट रूप देख रहे हैं। यह विराटता किस बात की है? क्या यह प्रभुत्व की भव्यता की है? या उस सत्य को पहचानने की है जो सभी कणों और क्षणों में विद्यमान रहता है, लेकिन दिखाई नहीं पड़ता? गीता ऐसी कई व्याख्याओं की गुंजाइश देती है, लेकिन इसकी सबसे बडी व्याख्या यही है कि हर युग का अपना एक युगसत्य होता है। हर युग की अपनी एक गीता होती है। इस मोड़ पर ठहर कर हम पूछ सकते हैं कि हमारी गीता कौन सी है, हमारा युगसत्य क्या है? आजाद भारत की गीता अगर देखनी हो तो हमें संविधान की वह किताब देखनी चाहिए जो आजादी के महाभारत से निकली है। यह एक क्रांतिकारी किताब है जिसमें सामाजिक बराबरी का एक सपना मौजूद है। वो सपना जो बीते जमानों की हकीकत से टक्कर ले रहा है। इस गीता का मर्म समझें तो हमें किसी और गीता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यह गीता समझ में आ जाए तो हम अपने भीतर छुपे कृष्ण को भी पहचान संकेंगे और खोए-भटके हुए अर्जुनों को भी।
(गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र बनाने के बारे में हाई कोर्ट की टिप्पणी पर)

1 टिप्पणियाँ:

संजय तिवारी ने कहा…

आजादी के संघर्ष से निकली गीता ने बहुत कमाल किये हैं.
दिल्ली में सीलिंग हुई तो उसी गीता को आधार बनाया गया और बाद में पता चला कि जज के बिल्डरों से कलुषित रिश्ते हैं.

कल ही एक जहाज को तोड़ने का आदेश देकर फिर इस आजादी के महाभारत वाले गीता की प्रासंगिकता सिद्ध कर दी गयी और सत्य को जबर्दस्ती हरवा दिया गया. सौदा कुछ करोड़ का.

ये तो तात्कालिक उदाहरण हैं. स्मृति के सहारे पीछे चलेंगे तो उदाहरणों से अटा पड़ा है हमारा अतीत.

मुहावरों की चासनी में लच्छेदार शब्दों का प्रयोग कर छद्म लोकतंत्र को युगसत्य नहीं ठहराया जा सकता.

कोई भी युग हो सत्य सनातन रूप से एक ही होता है. सिर्फ युगधर्म बदलते हैं.