रामकथा समुद्र के किनारे आकर ठहरी हुई है। ये समुद्र पार हो तो कथा आगे बढ़े। यहां वाल्मीकि वानरों का सहारा लेते हैं और समुद्र पर सेतु की कल्पना करते हैं। इस कल्पना ने सदियों तक भारतीय जनमानस पर अलग-अलग ढंग से असर डाला है। लेकिन कल्पना को जब ठोस समुद्रों में ढूढ़ने की कोशिश की जाने लगे, जब सदियों और समुद्रों के आरपार आती-जाती कथाओं को छोटे मकसदों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगे तो मानना चाहिए कि स्मृति कहीं ठहरी हुई है, कहीं उसे वर्तमान की ताजा हवाएं नहीं मिल रहीं। रामकथा के आधार पर सेतुसमुद्रम का विरोध करने वाले लोग भी ऐसी ही ठहरी हुई स्मृति के शिकार हैं। उनके लिए सत्य वही है जो उनकी कल्पना गढ़ती है। इसे वो आस्था का नाम देते हैं और इसके आधार पर एक ऐसी परियोजना का विरोध करते हैं जो दो देशों के जुड़ाव को और करीब ला सकती है।
मामला सिर्फ आस्था का नहीं, आस्था की राजनीति का भी है। क्या वाकई सेतुसमुद्रम का विरोध करने वाले लोग एक विरासत को बचाने की कोशिश कर रहे हैं? ऐसा नहीं दिखता क्योंकि अतीत में ऐसे किसी संरक्षण की चाह और कोशिश उनके कामों में कभी दिखी नहीं। ये लोग एक दौर में राम मंदिर बनाने निकले- भव्य मंदिर। लेकिन बाबरी मस्जिद गिरा देने के बाद जैसे मंदिर से उनकी दिलचस्पी खत्म हो गई। क्योंकि मंदिर वोट दिलाने में नाकाम रहा। अब इन्हें राम मंदिर के बाद रामसेतु चाहिए। बस इसलिए कि वो इसके सहारे आस्था की राजनीति को नई सांस और उम्र दे सकें। इस बात को ठीक से समझने की जरूरत है। रामकथा तभी सार्थक होगी जब वो नए रास्ते बनाने की गुंजाइश निकालेगी, ऐसे टूटे-फूटे नकली पुलों की आड़ नहीं लेगी, जिनसे होकर कोई जहाज नहीं गुजर सकता।
शनिवार, सितंबर 15, 2007
सेतुसमुद्रम के बहाने
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2 टिप्पणियाँ:
आपका लिखा हुआ सुनना भी अच्छा लगता है और पढ़ना भी।
जब तक इस तरह की निर्भिक पत्रकारिता जिंदा है तब तक देश में लोकतंत्र जिंदा रहेगा। बात पते की एक प्रकार से एनडीटीवी का एडिटोरियल है। इससे पता चलता है कि आपके चैनल की मंशा क्या है। मैं लगातार आपकी टिप्पणियां सुनता रहता हूं। सचमुच ये उद्वेलित करने वाली होती है। बहुत बढ़िया।
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