यह कह देना बहुत आसान है कि कांग्रेस नेहरू, इंदिरा, राजीव और सोनिया के बाद अब राहुल गांधी की शरण में जाती दिखाई पड़ रही है। इस वंशवाद की आलोचना करना भी बेहद आसान है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस नाम का विराट संगठन अक्सर नेहरू-गांधी परिवार के चुंबक से जैसे चिपका रहता है? ऐसे उदाहरण कम नहीं हैं जब खुद को बड़ा समझने वाले नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी। कांग्रेस के पहले बड़े विभाजन के वक्त ही लगभग सभी बड़े नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ रहे, फिर भी कांग्रेस इंदिरा की हो गई, संगठन कांग्रेस इतिहास के गर्त में कहां खो गई, अब किसी को याद नहीं है। इसी तरह एक दौर में देवराज अर्स से लेकर अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी ने बगावत कर अपनी कांग्रेस बनाई, लेकिन सबको समझ में आया कि लौटना मूल पार्टी में ही होगा। एनसीपी बनाने के बाद शरद पवार एक क्षत्रप भर रह गए और उन्हें उन्हीं सोनिया गांधी का नेतृत्व मंजूर करना पड़ा जिनके विदेशी मूल के खिलाफ वो बागी बने।
दरअसल ये सारी मिसालें याद दिलाती हैं कि कांग्रेस जितने अंतर्विरोधों और क्षेत्रीय रंगों को समेटने वाली पार्टी है, उन सबको कोई ऐसा नेता ही मंजूर हो सकता है जिसकी ताकत किसी जाति या क्षेत्र से नहीं, एक विरासत से आती हो। नेहरू गांधी परिवार की ताकत यही है। वह विरुद्धों को जोड़ता है- सबकी अपनी सूबेदारी बने रहने की गारंटी देता है। निश्चित तौर पर ये कोई आदर्श स्थिति नहीं। नेहरू गांधी परिवार पर कांग्रेस की निर्भरता इसलिए भी बढ़ी है कि अब उसके पास न कोई कार्यक्रम है न आंदोलन जिससे कार्यकर्ता या नेता निकलें। लेकिन नेहरू गांधी परिवार का नेतृत्व जिन लोगों को अलोकतांत्रिक लगता है, उन्हें अपने दुराग्रहों के पार जाकर ये देखने की जरूरत है कि किस तरह कांग्रेसजन ही एक दौर में सोनिया को और अब राहुल गांधी को आवाज देते रहे हैं।
बुधवार, सितंबर 26, 2007
गांधी नाम की बैसाखी की जरूरत
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2 टिप्पणियाँ:
वंशवाद को सही मानना मुझे सही नहीं लगता । वो राजनीति में हो, फिल्मों में हो या किसी भी अन्य क्षेत्र में। लेकिन सच यहीं हैं कि वंशवाद आज से नहीं बल्कि सृष्टि के निर्माण से ही जु़ड़ा हुआ हैं। वो घृतराष्ट हो या कैकयी। सभी ने अपने खून के साथ इंसाफ के लिए कइयों के साथ नाइंसाफी की। लोकिन हम सिर्फ दूसरों को क्यों देखते हैं। हम भी वही हैं। हम में से कई पत्रकारिता से जुड़े हैं। जानते होगें कि कोई संघर्षशील यदि फोन करता है तो पहला सवाल होता है -भाई किसके रिफरेन्स से बात कर रहे हो।
दीप्ति
वंशवाद पर की गई मेरी टिप्पणी शायद पत्रकारिता की सच्चाई भी बता गई इस लिए शायद पच नहीं पाई। धन्यवाद।
दीप्ति।
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