इसमें शक नहीं कि भारत ने तरक्की की है। साठ के दशक में साइकिल खरीदने के लिए सोचता और बजट बनाता हिंदुस्तान आज धड़ल्ले से कार खरीद रहा है, जहां घरों में चटाई और सुराही हुआ करती थी, वहीं अब सोफासेट और फ्रिज चला आया है, कभी लोगों के लिए ट्रांजिस्टर लेना मुश्किल हुआ करता, आज झोपड़पट्टियों में भी टीवी नजर आते हैं और कंप्यूटर वो चीज है जिससे बच्चे भी खेलते हैं। ये वो चमकता हुआ भारत है जिसमें इमारतें ऊंची हो रही हैं, सड़कें चौड़ी हो रही हैं, फ्लाईओवर बन रहे हैं, लोग मालामाल हो रहे हैं, कारखाने भरपूर मुनाफा उगल रहे हैं, लोगों के पास खरीदने को बहुत सारा पैसा है, और बाजार के पास बेचने को बहुत सारा सामान। लेकिन एक भारत और है जिसके लिए जीना लगातार मुश्किल होता चला गया है। इस भारत में प्रेमचंद के होरी काफी तादाद में बढ़ रहे हैं और आत्महत्या करने को मजबूर हैं। गरीबी और कर्ज के जाल के अलावा टूटता हुआ सामाजिक ताना-बाना वो नई सच्चाई है जिसने गरीब का गला घोंट डाला है। उसके पास न सस्ते स्कूल बचे हैं न कायदे के अस्पताल। वो न तालीम हासिल कर पा रहा है न ढंग से इलाज करा पा रहा है।
ये दोनों भारत एक-दूसरे से इतने अलग और दूर हैं कि यकीन नहीं होता कि वो एक ही समाज के हिस्से हैं। दरअसल इस मोड़ पर भारत की सारी तरक्की सवालों से घिर जाती है, और उससे भी कहीं ज्यादा अंदेशों से। ये साफ नजर आ रहा है कि इस देश में जितनी अमीरी बढ रही है, उतनी ही गरीबी भी। इस गरीबी से लड़े बिना अपनी अमीरी पर हम रीझते रहेंगे तो ऐसी गैरबराबरी को जन्म देंगे जो पूरे समाज के लिए खतरनाक होगी।
(मुकेश अंबानी के देश का पहला खरबपति बनने की खबर पर)
बुधवार, मई 30, 2007
अमीर हुए और भी अमीर...
शनिवार, मई 26, 2007
इंसान और धर्म का रिश्ता
पंजाबी के मशहूर उपन्यासकार गुरदयाल सिंह के उपन्यास परसा का नायक पक्का सिख है, गुरुओं के दिए मंत्र और सबद के सहारे कटती है उसकी जिंदगी। लेकिन परसा के लिए धर्म का मतलब ऐसी बेड़ी नहीं है जो उसकी जिंदगी को बांध ले। उसका बेटा शहर जाकर बाल कटा आता है तो वो नाराज होता है, लेकिन इसलिए कि बाल उसने दिखावे में कटाए हैं किसी तर्क से नहीं। दरअसल पंजाब में जो कुछ हो रहा है उसे देखते हुए गुरदयाल सिंह के इस उपन्यास की याद आती है तो इसलिए कि इंसान और धर्म के बीच का जो बेहद बारीक रिश्ता है, उसकी बड़ी गहरी पहचान इस रचना में मिलती है। हमारे समय में धर्म की ये भूमिका लगातार घटती जा रही है और कभी वो सियासत का सामान बनता दिख रहा है कभी नफरत का औजार। शायद इसलिए कि धर्म में विचार पीछे छूट गया है संगठन बड़ा हो गया है। इस संगठन को विचार बस मुलम्मे की तरह चाहिए। किन्हीं नाजुक मौकों पर अपने लिए कवच की तरह इस्तेमाल करने को। आम लोगों के लिए धर्म अपने सबसे पुराने भरोसे का नाम है- ऐसे भरोसे का जिसने उसने कभी अंधेरे से बचाया कभी आग से और कभी ना समझ में आने वाली कुदरती मुश्किलों से। लेकिन जब राजनीति धर्म का इस्तेमाल करती है तो वो इस भरोसे को नए अंधेरे और नई आग के हवाले कर देती है। वो हमारी रगों में बहती आस्था को इस तरह खौलाती है कि वो किसी लावे की तरह फूट पड़ती है। इस लावे में पंजाब कई बार झुलसा है। बंटवारा अब साठ साल पुराना हो गया लेकिन उसकी यादें अब भी ताजा हैं। यही नहीं, अस्सी के दशक के वो खौलते हुए दिन भी पुराने नहीं पड़े हैं जब मजहब की पहचान के नाम पर नफरत बोने का एक खौफनाक खेल कई साल चला। पंजाब को अब ऐसी नफरत नहीं चाहिए। वो इस नफरत के पार जाएगा तो धर्म के नए मानी खोजेगा, आस्था का नया मतलब समझेगा- वो मतलब जो इंसानियत के लिए मरहम भी बन सकता है मशाल भी।
शुक्रवार, मई 25, 2007
दाऊद की दुनिया कब तक
दाऊद की दुनिया बहुत बड़ी है। लेकिन ये सच्चाई उससे भी ज्यादा बड़ी है कि हर जुर्म का हिसाब इसी जिंदगी में चुकाना पड़ता है। कई बार ये सच्चाई हारती-हांफती नजर आती है, कई बार लगता है कि जुर्म की अंधेरी दुनिया इंसाफ के उजाले को लील लेती है, लेकिन अंत में कोई न कोई गली इंसाफ की निकल आती है जहां उम्मीद और भरोसे की रोशनी होती है। इसमें शक नहीं कि साठ साल से ऊपर की हसीना पारकर अब तक बेखौफ घूमती रही है- कुछ इसलिए कि उस पर कोई बड़े आरोप नहीं हैं और कुछ इसलिए कि वो उस शख्स की बहन है जिसका जुर्म की दुनिया में दबदबा चलता है। ये दबदबा इसलिए भी कायम है कि जुर्म की अंदरूनी दुनिया के आपसी भाईचारे में कुछ पुलिसवालों की भी शिरकत है और कुछ नेताओं का हिस्सा भी।
ये सवाल अक्सर पूछा जाता है कि कभी ये दबदबा खत्म होगा या नहीं, कभी दाऊद के गोरखधंधों पर रोक लगेगी या नहीं, लेकिन दरअसल ये सवाल ही बताता है कि लोग जानते हैं कि कभी न कभी ये दौर भी बीतेगा। ये नियतिवादी उम्मीद भर नहीं, उस व्यवस्था पर भरोसा है जो देर-सबेर अपराधी को अपनी गिरफ्त में ले लेती है। दरअसल जब लोग ये जानना चाहते हैं कि किसी दाऊद के गोरखधंधे रुकेंगे या नहीं, तो उनका सीधा-सादा मतलब ये होता है कि हमारी राजनीति, हमारी पुलिस और हमारे तंत्र से कब ऐसे लोगों को पनाह मिलनी बंद होगी। वैसे इस पनाह के बावजूद दाऊद और उसका संसार बचा रहेगा, इसकी गारंटी नहीं है। अभी ही वो एक थका हुआ मुजरिम नजर आता है जिसे कुछ उसकी पुरानी तस्वीरों ने बचाया हुआ है और कुछ नए संपर्कों ने। वरना भाई को एक दिन लौटना भी पड़ेगा और उस सबका हिसाब लौटाना पड़ेगा जो उसने इतने सालों में छीना, झपटा, लूटा और इकट्ठा किया है।
गुरुवार, मई 24, 2007
कौन करे सच्चा सौदा...
गुरु नानक ने जब भारत के बहुत सारे धर्मों और पंथों के बीच एक नया रास्ता खोजा तो उनमें कोई अलग लीक बनाने का अहंकार नहीं था, बल्कि तमाम रास्तों में दिखाई पड़ने वाली अच्छी चीज़ों को एक जगह ले आने का बड़प्पन था। कहते हैं बचपन में जब वो सौदा लेने जाते तो अपनी रकम किसी जरूरतमंद को दे आते। दरअसल ये नानक थे जिन्हें सच्चे सौदे की खबर थी और जो जानते थे कि उनके हिस्से की तकलीफ कोई बैद नहीं दूर कर सकता क्योंकि वो दिल में बसी है- बैद बताए बैदगी, पकड़ टटोले बांह, भोला बैद न जाने दर्द कलेजे माह। लेकिन ये तकलीफ नानक की अपनी नहीं थी, पूरे समाज की थी। इसीलिए एक बड़ा समाज उनके पीछे चल पड़ा। इस समाज को इतिहास ने बहुत सारी तकलीफें दी, बहुत सारे जख्म दिए, लेकिन नानक के सदभाव और भरोसे का मलहम लेकर वो चलता रहा, बचा रहा। क्या अब भी इस समाज को नानक याद आते हैं? क्या जिस पवित्र ग्रंथ के आगे वो रोज सिर झुकाता है, उसमें शामिल कविताएं उसे याद हैं? आज का पंजाब इसकी तस्दीक नहीं करता। ठीक है कि उसकी आस्थाओं को चोट पहुंची है। किसी को ये हक नहीं कि वो गुरु गोविंद सिंह का अपमान करे। लेकिन गुरु गोविंद सिंह इतने बड़े हैं कि छोटी-छोटी चूकों से उनका अपमान नहीं हो सकता। उनका अपमान तब होता है जब उनकी इज्जत के नाम पर सड़कों पर खून बहाया जाता है। दसवें गुरु ने अपने चेलों को कृपाण दिया, तलवार उठाने की इजाजत भी दी, लेकिन ये कहा कि जब सारे रास्ते बंद हो जाएं तब ये रास्ता अख्तियार किया जाए। लेकिन ये मानने की कोई वजह नहीं है कि पंजाब में सारे रास्ते बंद हो गए हैं। भरोसा करना चाहिए कि वहां अमन लौटेगा और नानक और गोविंद सिंह के जज्बे को कोई खरोंच नहीं पहुंचेगी।
सोमवार, मई 21, 2007
उन्हें गोली मार दो...
जो सपने देखने की, इश्क करने और अंगड़ाइयां लेने की उम्र होती है, उस वक्त क्यों कुछ नौजवानों की आंखों में उतर आते हैं खूनी मंसूबे। क्या उनकी आंखों के सूनेपन में झांकता है हमारे समाज का कोई सूनापन? उनकी तल्खी उनके भीतर के अंधेरे से पैदा होती है या बाहर पसरी आग से? आतंकवादियों की गोली से मरने से पहले मशहूर पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश ने लिखा था, सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। सपने नहीं रहते तो मकसद नहीं रहता...मकसद नहीं रहता तो जिंदगी की कोई कीमत नहीं रह जाती। जिंदगी की कीमत नहीं रहती तो कुछ दूसरे सौदागर चले आते हैं इसका सौदा करने। ये सौदा दुनिया को कितना भारी पड़ता रहा है इसका अंदाजा उन तबाहियों भर से नहीं लगाया जा सकता जो आतंकवादी हमलों ने पिछले कुछ दशकों में मचाई है। ये दरअसल उन नौजवानों के भटकाव से लगाया जा सकता है जिनके इरादों को कोई जमीन नहीं मिली। जान लेने और देने की हद तक जाने को तैयार इन नौजवानों के हौसलों पर शक नहीं किया जा सकता, उनकी काबिलियत पर भी सवाल नहीं उठाए जा सकते जो दुनिया की सबसे ताकतवर सरकारों को परेशान रख सकते हैं। लेकिन कितने खौफनाक ढंग से बरबाद हो रही हैं ये जिंदगियां, ये सवाल हम कभी अपने-आप से नहीं पूछते। जो आतंकवादी हैं उन्हें गोली मार दो, क्योंकि वो जिंदगी की कद्र करना नहीं जानते, ये सीधा-सादा तर्क सरकारों को रास आता है, क्योंकि इससे बेहद सरल ढंग से पूछा जाने वाला ये जटिल सवाल छुप जाता है कि आतंकवादी पैदा होते हैं या बनाए जाते हैं। इन्हें बनाने वाले सिर्फ गुमनाम संगठन या नापाक इरादों वाले नेता नहीं होते, कई बार समाज के वो हिस्से भी होते हैं जो इन्हें अपने से दूर धकेलते चलते हैं।
सोमवार, मई 14, 2007
मैं पैदा नहीं होती, बनाई जाती हूं
मैं लड़की हूं- वो लड़कीं जिसके बारे में सिमोन द बोवा ने कहा था कि वो पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। लोग मुझे तरह-तरह से बनाते हैं। मुझे सेवा करने लायक बनाते हैं। सुंदर दिखने लायक बनाते हैं। वो मेरा तन तराशने से पहले मेरा मन तराशते हैं। बताते हैं, खूबसूरत दिखना मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद है। वो पहले अपने आनंद के लिए मेरा इस्तेमाल करते हैं, फिर अपने कारोबार के लिए। वो मेरी कोमलता से अपना सामान सजाते हैं, मेरी सुंदरता से अपनी दुकान। मैं जब रैंप पर चलती हूं तो सबसे पहले अपने वजूद पर पांव रखती हूं। मुझे मालूम रहता है कि ये नाजुक संतुलन, ये खूबसूरत लचीलापन, ये दिपदिपाती काया, ये रोशनियां, ये चमक-दमक मेरे लिए नहीं, एक बड़े कारोबार के लिए है। मुझे मुस्कुराना है, मुझे अच्छी बातें कहनी हैं, मुझे अपनी घबराहट, अपने आंसू रोकने हैं, अपने उस शर्मीलेपन को कुचलना है जो किसी बचपन से कहीं से मेरे साथ चला आया। मुझे आत्मविश्वास और कामयाबी से भरपूर नजर आना है, और अपने इस डर को दबाना है कि जब ये तराश नहीं रहेगी, जब वक्त की रेखाएं मेरे जिस्म पर दिखाई देने लगेंगी, जब जिंदगी की आपाधापी में मेरे पांव कांपते रहेंगे, तब मेरा क्या होगा। मैं लड़की हूं। अपनी त्वचा से प्यार करती हूं, सुंदर दिखना चाहती हूं, कोमल बने रहना चाहती हूं, लेकिन नहीं जानती कि इन मासूम इच्छाओं के लिए मुझे कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। सिर्फ मुझे मालूम है कि सुंदरता तन से कहीं ज्यादा मन में होती है, दृश्य से कहीं ज्यादा आंख में होती है, वो तराशी नहीं जाती, अपने वजूद और अपनी शख्सियत की एक-एक शै के बीच ढलती है, और बहुत कम ऐसे मौके आते हैं जब वो अपनी पूरी कौंध के साथ दिखाई पड़ती है। दरअसल वो रैंप पर सैकड़ों लोगों के बीच की नुमाइश में जितना नजर आती है उससे कहीं ज्यादा उन रिश्तों में झलकती है जिसमें देह ही नहीं, रूह तक पारदर्शी हो जाती है।
बुधवार, मई 09, 2007
कितना टिकाऊ है ये इंसाफ
शहाबुद्दीन को मिली उम्रकैद इंसाफ का बस पहला कदम है। कहना मुश्किल है कि जब ये मामला ऊपरी अदालतों में पहुंचेगा तो टिकेगा या नहीं। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि आम तौर पर इस देश में कानून ताकत का गुलाम है। शहाबुद्दीन एक ताकतवर शख्स हैं- उनके पास अपने बाहुबलियों की भी ताकत है और राजनीति की भी। वो गवाहों को खरीद सकते हैं, उन्हें डर-धमका सकते हैं और जरूरत पड़ने पर अच्छे वकीलों और खराब पुलिसवालों की मदद से अदालत में कुछ भी साबित कर सकते हैं। हालांकि आम तौर पर ये अकाट्य लगने वाली सच्चाई टूटती भी रही है। जो लोग खुद को कानून से बड़ा समझते हैं, उसके साथ खिलवाड़ करते हैं, वो एक दिन अचानक पाते हैं कि उनके हाथ-पांवों में अलग-अलग धाराओं की बेड़ियां हैं, वो जेल में हैं और उनके खिलाफ इंसाफ की लड़ाई अचानक तेज हो गई है। दरअसल इस देश में कानून की यही छुपी हुई ताकत कमजोर आदमी की उम्मीद है। ये कानून सुस्त है, देर से होता है, दब कर रहता है, लेकिन किसी मुश्किल समय में मुजरिम का गिरेबान पकड़ लेता है। यही वजह है कि शहाबुद्दीन सांसद होते हुए भी सलाखों के पीछे हैं और अब उम्रकैद की सजा उनके सामने है। लेकिन सवाल एक अदालती फैसले या शहाबुद्दीन का नहीं है। उस प्रक्रिया का है जो शहाबुद्दीन जैसे दागी लोगों को संसद तक ले आती है और ये भरोसा दिलाती है कि वो कितने भी बड़े जुर्म करें, उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता। ये लोग जेल में रहकर चुनाव लड़ते हैं, सरकारें बनाते और गिराते हैं और हुकूमत करते हैं। ये सिलसिला एक फैसले से नहीं टूटेगा, इसके लिए कहीं ज्यादा बड़ी लड़ाइयों का इंतजार करना होगा। हो सकता है कि देर-सबेर ऐसे ही फैसलों से उसका भी रास्ता बने।
रविवार, मई 06, 2007
कई बिंदुओं से बनी 'रेखा'
फिल्म यात्रा में रेखा वो किरदार है जिसे लेखक खोजने निकला है। खोजता है तो पाता है कि ये कोई और रेखा है। दरअसल रेखा अक्सर ऐसे ही अनजान बिंदुओं से बनती रही हैं। कभी अपने किरदारों में ढली, कभी उनके बाहर खुद को खोजती हुई। फिल्म उमराव जान के आखिरी हिस्से में अपने बचपन के शहर में पहुंचकर उमराव जान पूछती है, ये क्या जगह है दोस्तों ये कौन सा दयार है। ये सवाल उमराव जान का है या रेखा का जो शायद उमराव जान की आंखों से अपना बचपन, अपना सफर देख रही हो? वो कौन सी चीज होती है जो किसी अभिनेत्री के हिस्से किसी किरदार की तकलीफ, उसका अकेलापन, उसके सवाल भर देती है? और उमराव जान या रेखा ये सवाल किससे पूछ रही है। दरअसल ये अपने-आप से पूछा गया सवाल है, उन निगाहों से जिनके आगे गुबार ही गुबार है। कोई अभिनय इसीलिए सच्चा होता है कि हम उसमें उतर कर अपने हिस्से की तकलीफें अपने हिस्से के सवाल पूछते हैं। सिर्फ एक कामयाब फिल्म करने की इच्छा या एक बेहतर अभिनेत्री होने का गुमान होता तो शायद रेखा इस अभिनय में वो जान नहीं डाल पातीं जो उन्होंने डाल दी है। यहां से एक दूसरी विडंबना हमारा पीछा करती है। ये कौन रेखा है जिसे हम पहचानते हैं? ढेर सारी फिल्मों के परदे के पीछे खड़ी, ढेर सारी अलग-अलग भूमिकाओं को जी रही वह असली रेखा कैसी है जो दूसरों के बुने तनावों को सेट पर ही सही, लेकिन अपना बना लेती है? ये रेखा दोस्ती करती है तो गॉसिप से घिरती है, मोहब्बत करती है तो चोट खाती है, झगड़े करती है तो बदनाम होती है, अकेले और उदास रहती है तो किसी की नजर नहीं पड़ती। ये हकीकत से ज्यादा हमारे ख्वाबों की रेखा है- लोग इस रेखा पर फिदा होते हैं, उनकी अदाओं के दीवाने होते हैं, लेकिन शायद ही देख पाते हैं कि जिसने उन्हें इतने ख्वाब, इतने इंद्रधनुष दिए, उसके हिस्से का आसमान कितना सूना है।
शनिवार, मई 05, 2007
दुनिया का मकड़जाल और स्पाइडरमैन
तर्क और विज्ञान की इस दुनिया में स्पाइडरमैन जैसा कोई किरदार क्यों करोड़ों लोगों को अपने साथ बहा ले जाता है? क्या इस नई दुनिया से आक्रांत हमारे भीतर के किसी धूल भरे कोने में अपनी स्मृति के जाले में सिमटी कोई मकड़ी है जो इस स्पाइडरमैन में अपने हिस्से का भरोसा खोजती है? या किसी ईश्वर की चाहत में भटकता हमारा मन किसी सुपरमैन, स्पाइडरमैन या फिर शक्तिमान और हनुमान जैसे किरदारों से समझौता कर तसल्ली हासिल कर लेता है? इसमें संदेह नहीं कि हमारे बहुत सारे नायक हमारी आस्था से नहीं, हमारे डर से पैदा होते हैं। वो हमारी हिफाजत की गारंटी देते हैं, वो बताते हैं कि जब कोई काली छाया अपना हाथ हमारे ऊपर डालने की कोशिश करेगी वो कहीं से प्रगट होंगे और हमें बचा लेंगे। वो इस दरकती, टूटती और जलती हुई दुनिया में कहीं से आएंगे और हमारा हाथ थाम हमें वक्त के किसी सुरक्षित टापू में पहुंचा देंगे। लेकिन शायद ये सिर्फ डर भी नहीं है। एक स्तर पर ये हमारे भीतर की निडरता भी है जो जानती है कि तमाम हालात में किसी नामुमकिन लगने वाले ढंग से भी इंसान बचा रहेगा। इस ढंग से देखें तो सुपरमैन भी हमारे भीतर हैं और स्पाइडरमैन भी- वो लाल हो या काला, वो अहसान करे या बदला ले, वो नेकी करने के लिए निकले या तबाही का सामान खोजे, निकलता वह हमारे भीतर से ही है। कभी हम उससे लड़ते हैं और कभी उसे पोसते हैं। शायद यही वजह है कि नया होते हुए भी स्पाइडरमैन हमारी सबसे पुरानी स्मृतियां कुरेदता हैं, वो उन हिस्सों में एक पत्थर डालता है जिनकी तरंगें बहुत दूर तक जाती हैं। सात समंदर पार से चलकर आया ये स्पाइडरमैन हमें इसीलिए बहुत पराया या अविश्वसनीय भी नहीं लगता। हम जानते हैं कि जो कुछ वो कर रहा है, शायद नहीं कर सकता, लेकिन हम चाहते हैं कि वो ऐसा कर सके। और इसीलिए उसकी कामयाबी नहीं, उसकी कोशिश उसे हमारे लिए अपना बनाती है। स्पाइडरमैन हर बार लड़ता है और हर बार नई लड़ाई के लिए तैयार होता है।
शुक्रवार, मई 04, 2007
राजेंद्र बाबू से कलाम तक
राष्ट्रपति इमरजेंसी लाइट की तरह होता है जिसे तब रौशनी देनी चाहिए जब अचानक अंधेरा हो जाए। ये बात पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमन ने अपनी किताब माई प्रेसिडेंशियल ईयर्स में लिखी। वो एक ऐसे दौर के राष्ट्रपति रहे जब भारतीय राजनीति में अंधेरे बढ़ रहे थे और इस इमरजेंसी लाइट पर कुछ ज्यादा दबाव था। आर वेंकटरमन कॉपीबुक राष्ट्रपति माने जाते रहे- यानी ऐसे राष्ट्रपति, जो ज्यादा से ज्यादा कायदों पर चलें। इसमें संदेह नहीं कि भारत के ज्यादातर राष्ट्रपतियों ने मर्यादा और शालीनता की जो लक्ष्मणरेखाएं बनाईं, वो अब तक बनी हुई हैं। शायद उन्हीं का नतीजा है कि हमारे राष्ट्रपति अति उत्साह में कोई फैसले नहीं करते। न देश उनसे उम्मीद करता है कि वो संसद और सरकार को इस तरह चुनौती दें, जिससे यहां का लचीला लोकतंत्र खुद को खतरे में महसूस करे। लेकिन इसी वजह से कई बार राष्ट्रपति एक ऐसी बेबस मूर्ति हो जाता है जिसे राजनीति सिर्फ मुहर की तरह इस्तेमाल कर लेती है।
मगर सवाल ये है कि क्या राष्ट्रपति की निजी शख्सियत की छायाएं उसके पद और दायित्वों पर नहीं पड़तीं? देश के पहले राष्ट्रपति का परंपरावादी मिजाज किसी से छुपा नहीं रहा और कभी हिंदू कोड बिल पर और कभी किसी दूसरे कानून पर उनकी नाराजगी छुपी नहीं रह सकी। हालांकि राजेंद्र बाबू को मालूम था कि देश उनकी निजी मान्यताओं से बड़ा है और इसीलिए हर बार उन्होंने सरकार और संसद का फैसला मंजूर किया। बाद के दौर में ज्ञानी जैल सिंह कभी वफादारी और कभी बदले के सथ सियासत करते नजर आए, लेकिन कुल मिलाकर ये सारा कुछ राष्ट्रपति भवन की सीमाओं तक ही सिमटा रहा। तो क्या राष्ट्रपति का चुनाव अहम नहीं है और हमारे लिए ये बात बेमानी है कि अगला राष्ट्रपति कौन हो? निश्चित तौर पर नहीं। हमारा लोकतंत्र आज जिन संकटों से घिरा है, उसमें अपने पद की गरिमा के प्रति संवेदनशील एक राष्ट्रपति पहले की तुलना में आज कहीं ज्यादा जरूरी है और इसीलिए जरूरी है ये बहस कि अगला राष्ट्रपति कौन हो।
मंगलवार, मई 01, 2007
गुजरात पुलिस की 'देशभक्ति'
रक्षक के भक्षक होने की कहावत पुरानी है- बताती है कि किस तरह ताकत के मद में चूर रहने वाले लोग इंसाफ के साथ खिलवाड़ करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि फर्जी मुठभेड़ें तमाम राज्यों में होती हैं और पुलिस आम तौर पर इतनी संवेदनशील दिखाई नहीं पड़ती कि वो अपना काम करते हुए कुछ सब्र और एहतियात से काम ले। इससे ये पता चलता है कि जो कानून के रखवाले हैं, उनका भी कानून में कम भरोसा है। ये भी कि अक्सर ऐसी मुठभेड़ों के पीछे कानूनी उलझनों से बचकर अपराध को ठिकाने लगाने की मंशा नहीं होती, ये काम कभी अपनी हताशा छुपाने के लिए कभी तरक्की पाने के लिए, कभी किसी और फायदे के लिए और कभी अपनी ताकत पर खुद भरोसा करने के लिए किया जाता है।
गुजरात में आतंकवाद के खात्मे के नाम पर जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ ताकत का गरुर नहीं, उससे कहीं ज्यादा है। इसके पीछे कहीं ना कहीं वो सांप्रदायिक नफरत भी काम कर रही है जो कुछ साल पहले गुजरात के दंगों में दिखी और अब तक कम होने का नाम नहीं ले रही है। वरना जिन लोगों को पुलिस ने आतंकवादी होने के संदेह में मारा, वो कई दिन उनकी कैद में रहे। जाहिर है, उसे सच मालूम हो गया होगा। लेकिन उनकी दिलचस्पी सच से ज्यादा उस झूठ को बचाने में रही होगी जिसका खेल आतंकवाद से मुकाबले के नाम पर राज्य की पुलिस अरसे से करती रही है। टाडा और पोटा में गिरफ्तारियों से लेकर नकली मुठभेड़ों में हत्या तक ये सिलसिला अलग-अलग शक्लों में दिखता है। खौफनाक ये है कि एक हत्या को छुपाने के लिए पुलिस दूसरी हत्या करती है और उसके खून सने हाथों के बावजूद नेता उनकी पीठ थपथपाते हैं।