शनिवार, जुलाई 28, 2007

प्रतिभा के होने का मतलब

इसमें संदेह नहीं कि आज की औरत बहुत बदल चुकी है। वो रघुवीर सहाय के जमाने की उस औरत से कतई अलग है जो तबीयत ढीली और आंखें गीली होने के बावजूद सीली लकड़ी से जूझा करती थी और घर-परिवार के चूल्हे की आग में कोयले से पहले अपनी हd÷यां गलाया करती थी। इस औरत का रसोई घर भी बदल गया है, पहनावा भी। ठीक है कि वो मजाज लखनवी के कहे मुताबिक आंचल को पूरी तरह परदृचम नहीं बना रही, लेकिन कैफी आजमी के शब्दों में अपनी तारीख का उनवान उसने बदल डाला है। आज के हिंदुस्तान में इस हकीकत के कई चेहरे हैं। एक चेहरा आज राष्ट्रपति भवन पहुंचा है। प्रतिभा पाटिल देश की पहली नागरिक और तीनों सेनाओं के कमांडर के तौर पर उस मुकाम पर हैं जहां कोई भारतीय स्त्री इसके पहले नहीं थी। लेकिन क्या प्रतिभा की ये उपलब्धि भारत में महिलाओं की स्थिति का आईना है? निश्चित तौर पर नहीं। खुद प्रतिभा पाटिल को अहसास है कि इस देश में औरत होने का मतलब अब भी कई तरह की सामंती जड़ताओं से टकराते हुए आगे बढ़ना है। और प्रतिभा जितनी बडी हकीकत हैं, उससे कहीं ज्यादा बडी सच्चाई ये है कि ज्यादातर औरतें अब भी अपने समय और समाज में पीछे छूट जा रही हैं, छोड दी जा रही हैं। इसके बावजूद प्रतिभा के होने का एक खास मतलब है। राष्ट्रपति के तौर पर प्रतिभा अगर अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व का परिचय देती हैं, अपनी कोई छाप छोड़ पाती हैं तो इसका असर दूर-दूर तक जाएगा। क्योंकि प्रतिभा का जो प्रतीकात्मक मूल्य है, वो काफी बड़ा है। भारतीय राजनीति ने औरतों को पहले भी अहम भूमिकाओं में देखा है। इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी राजनीति के शिखरों पर रहीं। इन सबकी मौजूदगी का ताप अगर पूरे समाज पर नहीं होता तो न पंचायतों में इतनी महिलाएं दिख रही होतीं न संसद और विधानसभाओं में औरतों के आरक्षण का सवाल इतनी दूर तक पहुंच पाता। लेकिन प्रतिभा के सहारे स्त्री सशक्तीकरण का जो नया प्रतीक बन रहा है, उसे अगर आम औरतों की बराबरी का औजार बनाया जा सका, तब उनका होना कहीं ज्यादा सार्थक होगा।

रविवार, जुलाई 15, 2007

फिल्मों में बदलता रोल

हिंदी फिल्मों के लिए ये एक सुकून भरा सप्ताह रहा। एक ऐसा सप्ताह जिसमें एक अकेले प्रेमी का सुरूर भी चला और एक स्टार परिवार के अपने लोगों की साझा हसरत भी। दरअसल ये साल फिल्मों के लिए अब तक कुछ फीका साल रहा। कहने को गुरु भी दिखे और भेजा फ्राई होता देख हंसी भी आई। लंदन की एक लड़की से अपने ब्याह को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश में एक नौजवान भी नजर आया। लेकिन ये सारी कामयाबियां उस बड़ी कामयाबी की बराबरी नहीं कर सकीं जो बीते साल हिंदी फिल्मों ने पैदा की।
कई बड़ी और अच्छी और कामयाब फिल्मों के बीच गुजरे उस साल ने जो उम्मीद पैदा की वो इस साल पूरी नहीं हो सकी। लेकिन इसके बावजूद फिल्म का कारोबार मंदा नहीं पड़ा है। एक के बाद एक फिल्में बन रही हैं और सपनों के सौदागर जनता तक पहुंचने के लिए नए-नए रास्ते बना रहे हैं। एक परिवार के तीन-तीन नायक एक साथ परदे पर हैं तो गायक अब हीरो बनने की तमन्ना और चुनौती लिए दर्शकों के बीच है और कामयाब है। भरोसा करना चाहिए कि फिल्मों का ये सरूर इस साल कुछ और रंग बिखेरेगा।

रहस्य-रोमांच के तीन घंटे

कहीं से आती हुई कोई चीख, कहीं दिखाई पड़ने वाले खून के कतरे, जिस्म को सर्द करता डर और इन सबके बीच थरथराता कांपता रोमांच। आखिर रहस्य रोमांच की फिल्मों और कहानियों में ऐसा क्या होता है जो इंसान देखना पढ़ना चाहता है? क्या हम अपने आदिम डरों में अपने-आप को पहचानना चाहते हैं? या सिर्फ ये जीवन की एकरसता को तोड़ने वाली एक चीज है जो हमें अच्छी लगती है? दरअसल कुदरत के साथ इंसान का रिश्ता बहुत अबूझ और रहस्यमय रहा है। आग और पानी के राज और रिश्ते खोजने से बहुत पहले हमने पत्थरों, बादलों, आग और हवाओं को अपना देवता बना लिया क्योंकि तब हमारे पास अपनी हिफाजत के कोई साधन नहीं थे। जब ये साधन पैदा हो गए तो हमने दुश्मन खड़े कर लिए जिनसे ये पुराने देवता हमें नहीं बचा सकते। अब हम अपनी साजिशों, अपनी हसरतों, अपनी हिंसा के शिकार हैं और खुद इससे निजात पाना और इसका इंसाफ करना भी चाहते हैं। इसलिए हमारी फिल्मों के नायक कभी मर कर जी उठते हैं, कभी अपने खिलाफ चल रही साजिशों का पर्दाफाश कर हमें भरोसा दिलाते हैं कि कुदरत के खेल चाहे जितने रोमांचक हों, इंसान की कोशिशें उससे बड़ी होती हैं।
दरअसल हर रहस्यमय फिल्म के पार या तो भरोसे का एक उजाला होता है या आस्था का वो सुरमई रंग जिसमें हम खुद को किसी दूसरी बड़ी ताकत के हवाले कर निश्चिंत हो सकें। इन सबके बीच बंद दरवाज़ों के पार देखने, चीज़ों की तहों तक पहुंचने और परतों को हटाकर देखने की हमारी आदत और इच्छा कुछ ऐसी है कि हम किसी राज को राज रहने नहीं देना चाहते। फिल्मी परदे का राज भी हमें तब तक बांधे रखता है, जब तक वो पूरी तरह खुल नहीं जाता। शायद यही वजह है कि तीन घंटे की अंधेरी मोहलत में भी हम रहस्य रोमांच के उन तहखानों की सैर करना चाहते हैं जहां इंसानी फितरत का कोई अनदेखा पहलू छुपा हो सकता है।

बुधवार, जुलाई 11, 2007

आतंकवाद की सियासत

मैं आतंक हूं। मैं ट्रेन के धमाकों में, बिखरी हुई बोगियों में आता हूं। मैं रोते-बिलखते चेहरों में, न लौटने वाले मुसाफिरों की यादों में बचा रहता हूं। मैं छुपा कर रखे गए बमों, किसी घड़ी की तरह टिकटिक करते विस्फोटकों की शक्ल में दाखिल होता हूं और फूट पड़ता हूं। मेरे किरचे प्लेटफॉर्म पर, पूरे शहर में, पूरे मुल्क में पसर जाते हैं। मैं आतंक हूं, अक्सर किसी नामालूम मकसद की ओट में, किसी मासूम गुस्से की मदद से, काम करता हूं। मैं उन छात्रों और नौजवानों को हथियार बनाता हूं जो हाशिए पर हैं, जो पिटे हैं जो मायूस हैं। पहले मैं जज्बात से खेलता हूं, फिर खून से और इसके बाद सियासत से। मैं बाहर से आता हूं और भीतर घुल मिल जाता हूं। मैं कई जुबानें जानता हूं और वक्त पड़ने पर इस्तेमाल भी करता हूं।
मैं आतंक हूं, मेरी अपनी राजनीति है जिसे सरकारें भी खूब पोसती हैं। ये मेरा खौफ है जो इक्कीसवीं सदी के आजाद कहे जाने वाले मुल्कों के नागरिकों पर एक के बाद एक पाबंदी बढ़ा रहा है। मैं लंदन और ग्लासगो की नाकाम साजिशों में हूं, मुंबई के लोकल में हूं, लंदन के ट्यूब्स में और न्यूयार्क के टावर्स में। मैं दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क की सबसे ऊंची इमारत को जला डालता हूं। मैं पूरी दुनिया में हूं- दुनिया भर की सरकारें मुझे पहले ताकत देती हैं और फिर मुझसे लड़ने के तरीके खोजती हैं।
मैं आतंक हूं, मेरा अपना धर्म है जिसके अपने धर्मगुरु हैं। लोग मुझे अलग-अलग कौम के तौर पर पहचानने की कोशिश करते हैं और भूल जाते हैं कि आतंक की कोई जात नहीं होती। मैं छोटे-छोटे मकसद के लिए बड़े-बड़े गुनाह करने में हिचकता नहीं। मुझसे निबटने के लिए कानून बनाना काफी नहीं। हां, मुझे खत्म करने के लिए समाज को बदलना जरूरी है क्योंकि इस समाज की सलवटें जब दूर होंगी, जब वहां फांक कम होगी तो मेरी गुजाइश, मेरी जगह भी खत्म होती चली जाएगी। मैं आतंक हूं, लेकिन मुझपर वार करने से पहले मेरे होने की वजह समझें।

सोमवार, जुलाई 09, 2007

कफील क्यों बना कठपुतली

हो सकता है, लंदन और ग्लासगो की साजिश में शामिल एक चेहरा भारतीय हो, लेकिन क्या इससे भारतीयों पर आतंकवाद में शामिल होने की तोहमत मढ़ी जा सकती है? जो नौजवान इंग्लैंड से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक पकड़े जा रहे हैं, वो ऐसे नहीं रहे जो भारत में किन्हीं कठमुल्ला हाथों की कठपुतली बन जाते। उन्होंने मेहनत से पढ़ाई लिखाई की और देश के बाहर जाकर एक बेहतर भविष्य का सपना देखा। फिर ऐसा क्या हुआ कि वो एक जलती हुई जीप में बैठ गए और उन्होंने खुद को सलाखों के पीछे भिजवाने का इंतजाम कर लिया? वो कौन सा गुस्सा है, कौन सा अकेलापन, जो अपने-अपने मुल्कों से दूर इन लोगों को यूरोप के विश्वविद्यालयों में एक साजिश रचने का जुनून पैदा करता है? ये वो सवाल है जिस पर इंग्लैंड में बाहरी डॉक्टरों की आवाजाही को और सख्त बनाने की बात कर रहे ब्रिटिश प्रधानमंत्री को सोचना चाहिए। दरअसल आतंक का खेल दोतरफा है। इसके एक तरफ वो कट्टरपंथी ताकतें बैठी हुई हैं जो इंसानी तहजीब को अपनी जिद के घेरे के बाहर जाने नहीं देना चाहतीं और दूसरी तरफ वो सियासी शख्सियतें जो अपने मुल्क और कौम की बेहतरी और हिफाजत के नाम पर रंगभेद और नस्लभेद का खुला खेल खेलती हैं, जो अफगानिस्तान से लेकर इराक तक का इलाज अपनी जरूरत के हिसाब से करती चलती हैं। इस दोहरे खेल में घिर जाते हैं वो नौजवान जो एक तरफ की हताशा और दूसरी तरफ के गुस्से के बीच कोई रास्ता नहीं खोज पाते। इस बंद गली में आकर कभी वो बंदूक थाम लेते हैं और कभी खुद बम बन जाते हैं। लेकिन अगर उन्हें आतंक का औजार और सियासत का शिकार होने से बचाना है तो उनके अकेलेपन, उनकी नाराजगी, उनकी घुटन की मूल वजहों को समझना होगा और उन्हें दूर करना होगा।

हमारे खोदे हुए गड्ढे

24 घंटों से भी ज्यादा समय तक सूरज ने जिस अंधेरे से एक हारी हुई लड़ाई लड़ी, वो उसकी पैदा की हुई नहीं है। हम लगातार देख रहे हैं कि हमारे खोदे हुए गड्ढों में कभी हमारे प्रिंस गिर रहे हैं, कभी सूरज। क्या ये हमारे भीतर के गड्ढे हैं जिनमें फंसे-छटपटाते हम किसी प्रिंस या सूरज के जरिए अपने निकलने की कहानी देखना चाहते हैं? या हमारे भीतर कुछ न करने की बेबसी अचानक कुछ होता देख टेलीविजन के सामने ठहर जाती है? आखिर वो कौन सी चीज है जो एक अनजान गांव के गरीब बच्चे को हमारे इतना करीब ले आती है कि हम उसकी एक-एक हरकत पर नजर रखने लगते हैं, उसके लिए अपनी सबसे पवित्र और संजीदा दुआएं भेजते हैं। एक अंधेरी खोह में में गिरा ये छह साल का बच्चा क्या हमारे भीतर के उन अंधेरों की ओर इशारा कर रहा है जिन्हें न जाने कब से हमने खुला छोड़ा हुआ है? हमारी चेतना पर पड़ती ये कौन सी दस्तक है जो कुरुक्षेत्र से लेकर निमोड़ा तक में चल रही छोटी-छोटी लड़ाइयों में हमें भी सेना बना लेती है? बीते दो दिनों ने कई सवाल पैदा किए हैं। कई जवाब भी दिए हैं। कई साल पहले कृश्नचंदर ने एक कहानी लिखी, गड्ढा। एक गड्ढे में लोग गिरते जा रहे हैं, उन्हें बचाने की कोई कोशिश नहीं कर रहा। लेकिन यहां एक ऐसा गड्ढा है जिसके आगे जैसे पूरा देश खड़ा दिख रहा है। उसके सामने एक मकसद है, भले ही वो छोटा सा हो, सिर्फ छह साल का। छह साल का सूरज अगर बचा रहेगा तो उसके साथ ये भरोसा भी बचा रहेगा कि जिंदगी में किसी भी अंधेरे से लड़ने का रास्ता निकल आता है। बदकिस्मती से पिछले कुछ दिनों में हमारे कुछ सूरज इस अंधेरे से उबर भी नहीं पाए। लेकिन हम अगर फिर भी वहां खड़े हैं तो इसलिए नहीं कि हम सिर्फ तमाशबीन हैं। रोजमर्रा के कई गड्ढों को भले हम अपनी मजबूरियों में भूल जाते हों, या उन्हें अनदेखा कर देते हों, लेकिन वो हमारे भीतर कहीं बने रहते हैं, हमारे खोखलेपन के सबूत की तरह। प्रिंस से लेकर सूरज तक की कहानी याद दिलाती है कि हम अपने गड्ढों को भरने में कामयाब नहीं रहे हैं।