बुधवार, अगस्त 15, 2007

मैं अब भी जिंदा हूं!

मैं मोहनदास करमचंद गांधी हूं। मैंने बहुत मुसाफिरी की। एक दिन ट्रेन से फेंका गया। मैं नहीं मरा। उसी रात ये बात समझी कि इंसान होना और इंसानियत के लिए लड़ना आसान नहीं है, उसके लिए तपस्या करनी पड़ती है, उपवास रखने पड़ते हैं, दूसरों के किए के लिए खुद पश्चाताप करना पड़ता है। मैंने कई-कई दिन उपवास रखे। बीमार रहा। लेकिन तब भी मैं नहीं मरा। मैं ईश्वर और सत्य में भरोसा करता रहा। मैंने दुनिया के बहुत बड़े साम्राज्य से लोहा लिया। गुलामी मुझे इंसानियत के खिलाफ लगी। मैंने कहा हमें स्वराज चाहिए, सुराज नहीं। स्वराज के लिए भी मैंने कायदे बनाए। ऐसे कायदे जो आदमी की जरूरत से तय होते हों लालच से नहीं था। मुझे मालूम था कि ये धरती सबकी जरूरत के लिए काफी है, लेकिन एक आदमी के लालच के लिए छोटी पड़ सकती है। मैंने कहा अंग्रेज़ों भारत छोड़ो। भारतीयों के लिए नारा दिया- करो या मरो। लोगों ने कहा, इसके लिए देश तैयार नहीं है। मैंने कहा, मैं छोटा, मेरा लश्कर छोटा, मेरी तैयारी छोटी। इसके बावजूद मेरा आंदोलन चला, मैं नहीं मरा। फिर मैंने पाया, मेरे ही शिष्य मुझे अकेला छोड़ रहे हैं। मैंने कहा था, बंटवारा मेरी लाश पर होगा। लेकिन देश बंट गया, मैं बेबस देखता रहा। फिर तीन गोलियां मैंने भी खाईं। लेकिन इसके बावजूद मैं नहीं मरा। फिर मुझ सिपाही को लोगों ने संत बना दिया, महात्मा बना दिया, मेरी समाधि बनाई, उस पर फूल चढ़ाने लगे, मुझे तारीखों में, सिक्कों में, प्रतीकों में बदल डाला। फिर भी मैं नहीं मरा। मैं दरअसल एक व्यक्ति नहीं एक विचार हूं। धीरे-धीरे मैंने समझा है, सत्य सबसे बड़ा होता है- ईश्वर से भी बड़ा, वही दरअसल ईश्वर होता है। शायद इसी सत्य ने मुझे बचाया हुआ है- जो अपने बापू को याद करते हैं वो सत्य की इसी जरूरत को याद करते हैं और इससे ताकत हासिल करते हैं। मैंने कहा था, मैं सौ साल जिऊंगा। मैं जानता हूं, मैं लोगों के भीतर अब भी जिंदा हूं, एक ऐसे शख्स की तरह, जो उनकी आत्मा पर दस्तक देता रहता है।

दंगाइयों को सजा देने का जोखिम

इस बार दंगों की बारिश खूब हुई है, वोटों की फसल बहुत अच्छी होगी। कुछ ऐसा ही गोरख पांडेय ने अपनी एक कविता में लिखा था। दरअसल दंगों के पीछे जितना मजहब होता है, उससे कहीं ज्यादा सियासत होती है। इसी सियासत ने 1992-93 में मुंबई जैसे सेक्युलर महानगर के चेहरे पर भी सांप्रदायिक खरोंचे छोड़ दीं। जो शहर सड़कों पर नमाज के लिए जगह निकालने का आदी था, वहां महाआरती की एक सियासी जिद सामने आई और टकराव के नए मंजर भी। इस टकराव ने पूरे शहर को लहूलुहान कर दिया। उसके बाद के हादसे और भी हैरान करने वाले रहे। दंगों में झुलसने के बाद धमाकों से दहल गई मुंबई। लेकिन 92-93 के उन जख्मों को अब भी अपने सीने में छुपाए चल रहा ये महानगर अब भी अपने हिस्से का इंसाफ मांग रहा है। इंसाफ का एक तकाजा पूरा हो चुका है। दूसरा अभी बाकी है। बीते पंद्रह साल से ये महानगर देख रहा है, किस तरह उसके रहनुमा उसके साथ धोखा करते रहे हैं। जिन लोगों के दामन पर दंगों के दाग लगे, वो सरकारें चलाते नजर आए। दंगों में इंसाफ दिलाने के नाम पर आई सरकारों ने इस मामले में आंखें मूंद लीं। और जिस जज ने दंगों की जांच की और उसके पीछे के चेहरे उजागर किए, वो अब भी अपनी रिपोर्ट पर अमल की राह देख रहा है। उसे नहीं मालूम कि दंगों की सियासत में सिर्फ वोटों की फसल काटी जाती है, दंगाइयों को सजा नहीं दी जाती। ये मुंबई का नहीं, साठ साल के हिंदुस्तान का तजुर्बा है। लेकिन क्या मुंबई इस चलन को बदलने की मिसाल नहीं बन सकती? अगर हम एक साझा समाज, एक साझा भारत और एक साझी मुंबई बचाए रखना चाहते हैं तो ये हमारा फर्ज है कि 92-93 के सभी गुनहगारों को सजा दिलाएं।

मंगलवार, अगस्त 14, 2007

नहीं दबेगी तसलीमा की आवाज

तुम एक बैठी हुई चिड़िया को मार सकते हो।
तुम एक उड़ती हुई चिड़िया को मार सकते हो।
तुम उड़ने को तैयार एक चिड़िया को मार सकते हो।
लेकिन तुम दूसरी चिड़िया में उड़ने की इच्छा को नहीं मार सकते।

ये जानी पहचानी कविता फिर याद दिलाती है कि तसलीमा नसरीन या किसी लेखक को या उसके विचार को धक्कामुक्की करके हटाया और खत्म नहीं किया जा सकता। तसलीमा पर हमले की कोशिश ने सबको इतना तो बता ही दिया है कि तसलीमा की किताब अब तेलुगू में भी आ रही है। वो अनजाने में उन पाठकों तक पहुंच गई हैं जिनसे उन्हें दूर रखने की कोशिश की गई। दरअसल विचार या सरोकार की ताकत यही होती है। जब भी किसी विचार पर पहरा बिठाया जाता है, जब भी किसी सरोकार पर बंदूक तानी जाती है, वह जैसे उड़ान भर कर कहीं और पहुंच जाता है। किताब को जलाया जाता है तो उसकी राख कई किताबों में बदल जाती है। किसी तस्वीर को बिगाड़ा जाता है तो कई और तस्वीरें बनने लगती हैं। लेकिन सवाल है कि कुछ लोगों को तसलीमा नसरीन क्यों डराती है? क्या इसलिए कि वो सच लिखती है? इसलिए कि वो कुछ ऐसा लिखती है जिससे धर्म और नैतिकता की उनकी ठेकेदारी खतरे में पड़ती है? क्या इसलिए कि वो ईश्वर पर सवाल उठाती हैं और औरत के लिए जीने की आजादी और जगह मांगती हैं? दरअसल तसलीमा बहुत महान लेखिका भले न हो, उसने बहुत ऊंचे दर्जे का साहित्य भले न रचा हो, लेकिन उसने ऐसा साहस दिखाया है जो इस वक्त में कहीं नजर नहीं आता। यही साहस तसलीमा को एक प्रतीक में बदल डालता है जिस पर हमला लोगों को खुद पर हमला लगता है।

हमारे समाज का रोग

एड्स एक बड़ी बीमारी है- बेहद खतरनाक भी, लेकिन कोई समाज जितना बीमारियों से नहीं मरता, उतना अपने रवैये से नष्ट होता है। एड्स का हम मुकाबला कर सकते हैं, लेकिन उस डर, उस नासमझी का सामना कैसे करें जो अमानवीय ढंग से हमें अपने ही समाज के कुछ असहाय लोगों से काट डालती है, उन्हें अछूत बना डालती है। भारत सिर्फ एड्स का नहीं, कई बीमारियों का घर है। उन्नीसवीं सदी की बीमारियां इस इक्कीसवीं सदी में पलट कर हमला कर रही हैं। हम प्लेग, और पोलियो से भी लड़ रहे हैं। कैंसर एड्स की ही तरह रहस्यमय और जानलेवा बीमारी बना हुआ है। डायबिटीज को खामोश महामारी कहा जाता है। लेकिन और भी कई खामोश महामारियां इस समाज को बीमार बनाने में लगी हैं। हमने एक चमकता हुआ भारत बनाया है, लेकिन इस भारत में कई हांफते, खांसते, कराहते भारत भी शामिल हैं। वो बेदखल भारत शामिल हैं जो अपने घर-परिवार से सैकड़ों मील दूर जिंदगी और रोजगार की जद्दोजहद में रोज खुद को गला रहे हैं। छोटे-छोटे शहरों से देश के महानगरों तक जिंदगी की तलाश में पहुंचे ये लोग अपने जिस्म में मौत के कीड़े लेकर लौटते हैं और उनके घरवाले जान तक नहीं पाते कि आखिर उन्हें बीमारी क्या है। ये वो एड्स है जो शरीर को नहीं, समाज को खा रहा है। फिर कहना होगा कि इस एड्स का इलाज सिर्फ एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी से नहीं हो सकता। इसके लिए पूरे समाज की धमनियां साफ करनी होंगी, उसका रक्त बदलना होगा। ये काम आसान नहीं है, लेकिन इसके बिना हम एड्स और कैंसर के इलाज खोज भी लें तो भी अपने समाज को नहीं बचा पाएंगे। क्योंकि लोग इसलिए नहीं मर रहे कि दवाएं नहीं हैं, इसलिए मर रहे हैं कि उनके पास दवाओं तक पहुंचने के साधन नहीं हैं।