अमेरिका के साथ ऐटमी करार पर कांग्रेस और सीपीएम के बीच चल रही तनातनी से घबराए जो लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह देश मध्यावधि चुनाव झेलने को तैयार है, उन्हें राम मनोहर लोहिया का ये कथन शायद याद नहीं कि ज़िंदा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं। सच है कि लोहिया ने ये बात तब कही थी जब उनको लगता था कि केंद्र में कांग्रेस का स्थायित्व यथास्थिति का पोषक है और बदलाव का रास्ता रोक रहा है। आज हालात बदले हुए हैं। बीते पंद्रह साल में केंद्र हो या राज्य, सरकारें पत्तों की तरह गिरती रही हैं। चुनाव जनता पर एक बोझ की तरह हैं। लेकिन क्या इसीलिए लेफ़्ट फ्रंट को उस परमाणु करार का विरोध छोड़ कर कांग्रेस के सामने घुटने टेक देने चाहिए जो उसे देश के साथ विश्वासघात लग रहा है? अगर लेफ़्ट को लगता है कि यूपीए सरकार एक देशविरोधी फैसला कर रही है तो हर हाल में उसे चुनाव का डर छोड़कर सरकार से समर्थन वापस ले लेना चाहिए। इसी तरह अगर कांग्रेस को लगता है कि परमाणु करार एक ऐसा बड़ा मसला है जिस पर किसी तरह की वापसी मुमकिन नहीं तो उसे भी हक़ है कि वह अपनी सरकार को दांव पर लगा दे। बल्कि यह एक ज्यादा नैतिक कदम होगा कि सिर्फ सरकार बचाने और चलाने की ख़ातिर आप अपनी नीतियों से समझौता न करें। आखिर ऐसा आखिरी मौका न जाने कब आया होगा जब किसी सरकार ने किसी ठोस मसले पर सत्ता का मोह छोड़ा होगा। सिर्फ पांच साल सरकार चला देने भर के लिए सिद्धांतहीन राजनीति की आड़ लेंगे तो प्रकाश करात और सोनिया गांधी दोनों जनता के साथ कहीं ज्यादा बड़ा विश्वासघात कर रहे होंगे। ऐसी सिद्धांतहीन गठजोड सरकार ठीक इसके पहले केंद्र में पांच साल पूरे भी कर चुकी है। जनता ने इस स्थायित्व का उसे जो पुरस्कार दिया, वह अभी पुराना नहीं पड़ा है। इसमें संदेह नहीं कि परमाणु करार पर अगर लेफ्ट फ्रंट और यूपीए में कोई आम राय हो गई होती तो इससे अच्छा कुछ नहीं होता। लेकिन ऐसी आम राय बनाए बिना यूपीए अमेरिका से ऐटमी करार को आगे बढाता रहे और लेफ्ट सरकार का समर्थन करता रहे, ये मौकापरस्त राजनीति की मिसाल भर होगा जो कांग्रेस और सीपीएम दोनों को कठघरे में खड़ा करेगा। खतरा यही है कि सारे टकरावों के बावजूद दोनों एक-दूसरे को सहने की सहमति के शिकार न हो जाएं। लेकिन किसी भी लोकतंत्र प्रेमी के गले ये तर्क नहीं उतरेगा कि मध्यावधि चुनाव टालने की मजबूरी में दो दल एक-दूसरे के बिल्कुल विरुद्ध होते हुए एक-दूसरे का साथ देते रहें। जनता चुनावों का बोझ फिर भी उठा लेगी, अनैतिक और सिद्धांतविहीन गठबंधन का बोझ उठाना उसके लिए कहीं ज्यादा अहितकर होगा।
मंगलवार, अक्तूबर 23, 2007
कौन चाहता है चुनाव
शुक्रवार, अक्तूबर 05, 2007
आखिरी आदमी के लिए इंसाफ
हमारे देश में न्यायपालिका ने अपनी एक साख बनाई है। आम आदमी कचहरियों को चाहे जितनी गाली दे लेकिन इन कचहरियों में करोड़ों की तादाद में दर्ज मुकदमे बताते हैं कि अदालतें लोगों की आखिरी उम्मीद होती हैं। वो इन गलियों में कई-कई साल भटकते हैं, लेकिन एक दिन इंसाफ उनके दरवाजे होता है, उनकी मुट्ठियों में होता है। हालांकि इस साख के साथ जुड़ी सच्चाइयां और भी हैं। वकीलों ने इंसाफ को पैसे के खेल में बदल डाला है, जांच एजेसियां मजबूत और कमजोर आदमी में फर्क करती हैं और कई बार अदालतें पाती हैं कि इंसाफ के मामले में वो भी असहाय हैं। इन सबके बावजूद न्यायपालिका इस देश के लोकतंत्र की एक अहम कड़ी है। ये कड़ी हाल के दिनों में कुछ और मजबूत और सक्रिय दिखाई पड़ रही है, ये खुशी की बात है। लेकिन लोकतंत्र तभी ताकतवर होता है जब उसकी सभी कड़ियां, सभी परतें एक साथ काम करती हैं। तभी वह गरीब के झोंपडे से लेकर सत्ता के महल तक एक साथ आवाजाही कर सकता है। लेकिन जिस लोकतंत्र में कुछ कड़ियां कमजोर पड़ जाएं या कुछ तार ज्यादा बिजली फेंकने लगे, वहां शार्टसर्किट होने का खतरा बना रहता है।
कई बार लगता है कि हमारे देश में राजनीति की कड़ी कमजोर पड़ रही है तो अदालतें ज्यादा बिजली फेंक रही हैं। इससे कुछ चमक, कुछ चिनगारियां तो पैदा होती हैं, लेकिन वो असली रौशनी नहीं दिखाई पड़ती जो सबके लिए उजाला ला सके। दरअसल न्यायपालिका पर जवाबदेही इन दिनों कुछ ज्यादा है। लेकिन इसी लिए इस बात की जरूरत महसूस होती है कि उसकी निगाह अपने फैसले करते हुए इस देश के अंतिम आदमी पर रहे। गांधी जी ने जो जंतर बनाया था, जो कसौटी बनाई थी वो यही थी कि कोई काम अंतिम आदमी के लिए कितने काम का होता है। अदालतों के लिए ये कसौटी कुछ ज्यादा ही मायने रखती है।
सोमवार, अक्तूबर 01, 2007
सच बटोरने का जोखिम
पत्रकारिता की ऊपर से दिखाई पड़ने वाली चमक-दमक के बीच अक्सर ये बात गुम सी हो जाती है कि कई लोगों के लिए पत्रकारिता एक जोखिम भरा पेशा भी होती है। ये वो लोग होते हैं जो किसी खबर के पीछे मुल्कों और सरहदों के आरपार, एजेंसियों के अंदर और खबरों के बेहद करीब जाकर खड़े हो जाते हैं। मामला जंग का हो, आतंक का हो, किसी हादसे का हो, भूकंप का या सूनामी का हो, अक्सर अपनी सहूलियतों से बेपरवाह, अपने खतरों को पहचानते हुए भी कोई पत्रकार किसी मोर्चे पर जा पहुंचता है तो वो एक निहत्था सिपाही होता है जिसकी जान बड़ी आसानी से ली जा सकती है।
हुकूमतें सबसे पहले उस पत्रकार को निशाना बनाती है जो इस सिलसिले की पहली कड़ी होता है- वो रिपोर्टर जो कहीं जाकर, किन्हीं अंधेरों में दाखिल होकर, सूचनाओं की सेंधमारी करता है और अगले दिन के अखबार के लिए एक जरूरी मसाला जुटाता है। ये पत्रकार कभी डेनियल पर्ल हो सकता है आतंकवादी जिसका सिर काट दें और कभी जापान का कोई फोटोग्राफर हो सकता है जिसे म्यानमार के फौजी गोली मार दें। लेकिन उसकी ताकत यही होती है कि वो मरते-मरते भी अपना पेशा नहीं भूलता। उसके हाथ से उसकी कलम, उसका कैमरा नहीं छूटता- सच को पकड़ने की उसकी जिद नहीं खत्म होती, भले इसके लिए जो भी कीमत चुकानी पड़े।